SALVATION-MOKSH मोक्ष 

SALVATION-MOKSH मोक्ष 

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj

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नश्वरता दु:ख का कारण है। संसार आवागमन, जन्म-मरण और नश्वरता का केंद्र हैं। इस अविद्याकृत प्रपंच से मुक्ति पाना ही मोक्ष है।

संसार के दु:ख मय स्वभाव से मुक्त होने के लिये योग-समाधि, कर्म, ज्ञान या भक्ति मार्ग अपनाया जाता है। मोक्ष जीवन की अंतिम परिणति है। अज्ञान, दु:ख से मुक्त हो सकता है। इसे जीवनमुक्ति  कहते हैं। 

विदेह मुक्ति में सुख-दु:ख के भावों का विनाश हो जाता है। मनुष्य देह त्यागने के बाद आवागमन के चक्र से सर्वदा के लिये मुक्त हो जाता है। 

परमानन्द की स्थिति ही मोक्ष है। इसमें सारे द्वंद्वों का अंत हो जाता है। यह अद्वैतानुभूति की स्थिति है। अद्वेत से जो मोक्ष होता है, उसमें जड़ता-संसार से सम्बन्ध विच्छेद की मुख्यता रहती है और भक्ति से जो मोक्ष होता है, उसमें चिन्मय तत्त्व के साथ एकता की मुख्यता होती है।  

मुमुक्षु को श्रवण, मनन एवं निधिध्यासन, ये तीन प्रकार की मानसिक क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। इस प्रक्रिया में नानात्व, का जो अविद्याकृत है, विनाश होता है और आत्मा, जो ब्रह्मस्वरूप है, उसका साक्षात्कार होता है। मुमुक्षु तत्वमसि से अहंब्रह्यास्मि की ओर बढ़ता है। यहाँ आत्म साक्षात्कार ही मोक्ष है। 

जीवन मुक्ति की स्थिति में आत्मा ब्रह्म में लीन हो जाती है।

भेदान्तर के बाद प्रकृति शाँत हो जाती है और पुरुष मुक्त होकर निर्गुण रूप में समा जाता है। इसे ही कैवल्य-केवलता, अकेला रहना कहते है। जीवन के लक्ष्य में प्रकृति और पुरुष को अलग कर देना ही कैवल्य अर्थात मोक्ष है। 

प्रकृति-ब्रह्म की अपरा प्रकृति है। जीव ब्रह्म का अंश है। ज्ञान होने के बाद ब्रह्म की तरफ आरोहण होता है। विवेक उत्पन्न होने पर औपाधिक दुख सुखादि, अहंकार, प्रारब्ध, कर्म और संस्कार के लोप हो जाने से आत्मा के चितस्वरूप होकर आवागमन से मुक्त हो जाने की स्थिति ही कैवल्य है।

चित्‌ द्वारा आत्मा के साक्षात्कार से जब उसके कर्त्तृत्त्व आदि अभिमान छूटकर कर्म की निवृत्ति हो जाती है, तब विवेक-ज्ञान के उदय होने पर मुक्ति की ओर अग्रसारित आत्मा के चित्स्वरूप में जो स्थिति उत्पन्न होती है, उसकी संज्ञा कैवल्य है। 

परामात्मा में आत्मा की लीनता और न्याय के अनुसार अदृष्ट के नाश होने के फलस्वरूप आत्मा की जन्म-मरण से मुक्तावस्था को कैवल्य कहा गया है। 

जिन्होंने कर्मबंधन से मुक्त होकर कैवल्य प्राप्त किया है, उन्हें केवली कहा जाता है। बुद्धि आदि गुणों से रहित निर्मल ज्योति वाले केवली आत्म रूप में स्थिर रहते हैं। शुक देव जी, विदेह राजा जनक आदि जीवन्मुक्त थे, जो जल में कमल की भाँति, संसार में रहते हुए भी मुक्त जीवों के समान निर्लेप जीवनयापन करते थे।

मुक्ति के प्रकार ::

(1). सालोक्य :- इससे भगवद धाम की प्राप्ति होती है। वहाँ सुख-दु:ख से अतीत, अनंत काल के लिए है, अनंत असीम आनंद है। 

(2). सामीप्य :- इसमें भक्त भगवान्  के समीप, उनके ही लोक में रहता है। 

(3). सारूप्य :- इसमें भक्त का रूप भगवान् के समान हो जाता है और वह भगवान् के तीन चिन्ह :-श्री वत्स, भृगु-लता और कोस्तुभ मणी,  को छोड़कर शेष चिन्ह शंख, चक्र, गदा और पद्म आदि से युक्त हो जाता है। 

(4). सायुज्य :- इसका अर्थ है एकत्व। इसमें भक्त भगवान् से अभिन्न हो जाता है। यह ज्ञानियों को तथा भगवान् द्वारा मारे जाने वाले असुरों प्राप्त होती है। 

सार्ष्टि भी मोक्ष का ही एक अन्य रूप है, जिसमें भक्त को परम धाम में ईश्वर के समान ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता हैं। सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य, ये सभी भक्त को प्राप्त हो जाते हैं। केवल संसार की उत्पत्ति व संहार करना भगवान् के आधीन रहता है, जिसे भक्त नहीं कर सकता। 

प्रेमी-ज्ञानी भक्त भगवान् की सेवा को छोड़कर, उक्त सभी मुक्तियाँ भगवान् द्वारा दिए जाने पर भी स्वीकार नहीं करता। वह केवल भगवान् की सेवा करके, उनको सुख देना चाहता है। भक्त प्रेम का एक ही मतलब जानता है, देना, देना और देना। अपने सुख के लिए प्रेमी भक्त कोई अन्य कार्य -उपाय-उपचार नहीं करता।  

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