AUSPICIOUS DAILY ROUTINE शुभ दिन चर्या

AUSPICIOUS DAILY ROUTINE शुभ दिन चर्या

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj  santoshhastrekhashastr.wordpress.com

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Its essential to remain fit physically, mentally, spiritually. One has to programme his life style daily routine in such a way he is able to remain healthy, happy, prosperous and devoted to the Almighty. All activities crucial-essential, momentary, unprogrammed-unscheduled constitute one’s daily routine. It may vary from one person to another depending upon the availability of time. It essential to have recreation, joy in the busy life of one.

Ancient India has been following a water tight daily routine for the Brahmns, Virtuous, pious and those who believed in scriptures. generally the enlightened, scholars, philosophers in India still follow this routine. One used to get up early in the morning around 4 o’clock, take bath and then perform rituals-prayers, self study followed by professional necessities.

प्रातः ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजे उठने से उठने से लेकर रात को सोने तक की गई गतिविधियों, क्रिया कलापों को दिनचर्या कहा जाता है। यह व्यक्ति, व्यवसाय के लिए एक समान नहीं हो सकता।  फिर भी स्वस्थ रहने के लिये मनुष्य को जीवन में एक निश्चित समय सारिणी के अनुरूप चलना चाहिये। 

मनुष्य का भोजन, गतिविधियाँ, प्रकृति के अनुरूप होने चाहियें जो कि वर्तमान समय-समाज में सम्भव नहीं हैं। अब स्त्री-पुरुष, वृद्ध व्यक्ति समान रूप से अर्जन क्रिया में जुटे हैं। लड़कों की ही तरह लड़कियाँ भी स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई कर रही हैं।  लड़कियाँ भी नौकरी, व्यवसाय में रत हैं।

During the present era-Kali Yug, its not possible for all to follow that stereo-typed routine. The job-professional requirement s forces one to wake up late till night and get up late. Those who have to perform night duties can never stick to such routine, prescribed-described in scriptures. In fact its not meant for them.

The girls are attending schools , colleges and high level training in professional carriers, which makes extremely difficult for them to stick to daily chores of domestic life. However one can make his eating habits, schedule practical enough to keep him fit.Old people are not scared of word.

ऋषि गण सूर्य गति के अनुसार ब्राह्म मुहूर्त में प्रातः विधि, स्नान और संध्या करते थे, तत्पश्चात् वेदाध्ययन और कृषि कार्य करते और रात को शीघ्र सो जाते थे; इसलिए वे शारीरिक, मानसिक, भौतिक, आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ थे। आज लोग प्रकृति के नियमों के विरुद्ध आचरण करते हैं। इससे उनका शारीरिक स्वास्थ्य बिगड गया है। पशु-पक्षी भी प्रकृतिके नियमों के अनुसार अपनी दिनचर्या व्यतीत करते हैं।

The schedule of the sages is a model, but practically difficult to follow-adopt. It can keep one free from poverty, troubles-tensions.

धर्म शास्त्र में नियमित-नियम बद्ध आह्निक को प्रधानता दी है। इससे शरीर, मन, मनो विकृतियाँ, दरिद्रता, दुर्व्यसन, आपत्तियों काबू हैं। 

Daily practice of rituals-prayers, keeps the psyche of one stable-pure. The Brahmn has to perform two prayers, the first in the morning and the second in the evening, with the recitation of Gayatri Mantr. It keep his psyche pure. he remain devoted to the God.

नित्य कर्म मन-चित्त को शुद्ध करते है। ब्राह्मण को दोनों  संध्याएँ नियमित रूप  से गायत्री मंत्र का जप करके करनी चाहियें।  

India has a loosely caste-creed-more-hereditary based society; constituting of Brahmns, Kshtriy, Vaeshy and the Shudr. The physique, mental ability, working capability, habits are more or less determined by the gens-chromosomes DNA present in the individual.

As per tradition the Brahmn perform teaching and learning. The Kshtriy resort to protection of society. The Vaeshy serves the society by trading and agriculture. The Shudr provides all sorts of services to the society. As per definition of Shudr and one who is in service is a Shudr.

ब्राह्मणका नित्य कर्म-कर्तव्य है, अध्ययन और अध्यापन (अध्यात्म सीखना और सिखाना) क्षत्रियका नित्य कर्म-कर्तव्य है, दुर्जनों से समाज की रक्षा करना वैश्य का नित्य कर्म-कर्तव्य है, गौ-पशु पालन, कृषि और व्यापार द्वारा समाज की सेवा करना शूद्र का नित्यकर्म-कर्तव्य है, ब्राह्मण और क्षत्रिय के विशिष्ट व्यवसाय के अतिरिक्त कोई भी व्यवसाय करना।

The celibate has to serve his teacher and gain knowledge. He has to learn to be a socially useful person. He has to follow a rigid-tight schedule, under the supervision of the teacher in his Ashram-residence cum school, hermitage away form residential colonies. The household has to resort to earning, serving the society, nourish-nurture his family, pray to God, offer food to the guest, celibates & their teachers family. Retired life has to be spent in gaining virtues, learning, purification of body, mind and the soul.The hermit-recluse has to beg for his living, pray to God, resort to asceticism.

ब्रह्मचर्याश्रम में धर्म का पालन कैसे करें, इसका अभ्यास करना; गृहस्थाश्रम में देव, ऋषि, पितर और समाज ऋण चुकाना; वानप्रस्थाश्रममें शरीर शुद्धि और तत्त्वज्ञान के अभ्यास के उद्देश्य से साधना करना तथा संन्यासाश्रम में भिक्षाटन, जप, ध्यान इत्यादि कर्म करना, ऐसे नित्यकर्म बताए गए हैं।

The household divides the 12 hours during the day in 5 components. In the morning he resort to prayers. Time between noon and morning is used for earning livelihood. During the noon he perform rituals, prayers and sacrifices in holy fire. The full length of 24 hours is divisible in 30 sub components called Muhurt-auspicious time (48 minutes) for beginning some thing-event. 

The early morning session starts with becoming fresh and taking bath. One has to avoid Sun rise view. After the Sun rise morning prayers and rituals begin. It involves recitation of Gayatri Mantr and the worship of the deities-Almighty. The prayers include Panch Maha Yagy.

The period between the noon and the morning after prayers is utilized for earning livelihood, agriculture, crops, dairy-farming etc.

The middle segment of the day include bathing-washing hands, feet-legs and mouth, recitation of auspicious Mantr, Brahm Yagy and Bhut Yagy in addition to prayers.

Afternoon prayers include Pitre Yagy-homage to Manes & charity.

The evening session include recitation of Gayatri Mantr, listening -reading Purans, scriptures etc.

This is not enough. One has to perform atonement-penance to get rid of the sins of killing insects, worms, small living beings unknowingly.

दिन के (12 घंटों के) पांच विभाग हैं :– प्रत्येक विभाग तीन मुहूर्त के समान होता है। 24 घंटों के दिन में 30 मुहूर्त होते हैं। एक मुहूर्त अर्थात् दो घटिका अर्थात् 48 मिनट। संक्षेप में प्रत्येक विभाग 2 घंटे 24 मिनट का होता है। 

प्रातः काल (सूर्योदय से आरंभ) :- संध्यावंदना, देवता पूजन और प्रात: र्वैश्वेदेव। 

संगव काल :- संगव काल (दिन का 7 से 12 घटिका काल (दुग्ध दोहन काल) उप जीविका के साधन। 

मध्याह्न काल :- मध्याह्न स्नान, मध्याह्न संध्या, ब्रह्म यज्ञ और भूत यज्ञ। 

अपराह्न काल :-  पितृ यज्ञ (तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध इत्यादि)  और 

सायाह्न काल :- पुराण श्रवण तथा उस पर चर्चा करना और सायं वैश्वदेव और संध्या।

पंच महायज्ञ :-

अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम्। होमोदैवोबलिर्भौतोनृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥ 

शिष्य को शिक्षित करना (अध्यापन), ब्रह्मयज्ञ; पितरोंको तर्पण, पितृयज्ञ; वैश्वदेव-देवयज्ञ; बलि प्रदान-भूत यज्ञ तथा अतिथि पूजन-मनुष्य यज्ञ है।

ब्रह्म यज्ञ :: वेदों का अध्ययन (अर्थात् स्वाध्याय) तथा देवता और ऋषियों का तर्पण-ब्रह्म यज्ञ है।

पितृ यज्ञ :: पितरों को तर्पण करना (जिन ऋषियों की पूर्वजों में गणना की गई है :- सुमंतु, जैमिनी, वैशंपायन जैसे ऋषियों के तथा अपने पूर्वजों के नाम पर जल देने की विधि)

देव यज्ञ :: वैश्वदेव, अग्निहोत्र और नैमित्तिक यज्ञ देव यज्ञके भाग हैं।

नित्य होने वाली पंच सूना-जीव हिंसा के प्रायश्चित स्वरूप वैश्वदेव करना। नित्य उप जीविका करते समय मनुष्य द्वारा अनजाने में होने वाली जीव हिंसा को शास्त्र में पंचसूना कहा गया है।

वैश्वदेवः प्रकर्तव्यः पन्चसूनापनुत्तये। कण्डनी पेषणी चुल्ली जलकुम्भोमार्जनी॥[धर्म सिंधु]

कूटना, पीसना, चूल्हे का उपयोग करना, पानी भरना तथा बुहारना, ये पांच क्रियाएं करते समय सूक्ष्म जीव जंतुओं की हिंसा अटल है। इस हिंसा को ‘पंच सूना’ जीव हिंसा कहते हैं। ऐसी हिंसा हो जाए, तो ध्यानपूर्वक ‘वैश्वदेव’ प्रायश्चित का अंगभूत कर्म नित्य करें। उक्त हिंसा के परिणाम स्वरूप मनुष्य के मन पर हुआ पाप संस्कार दूर होता है।

वैश्वदेव विधि :: अग्नि कुंड में ‘रुक्मक’ अथवा ‘पावक’ नामक अग्नि की स्थापना कर अग्नि का ध्यान करें। अग्नि कुंड के चारों ओर छः बार जल घुमाकर अष्ट दिशाओं को चंदन-पुष्प अर्पित करें तथा अग्नि में चरु की (पके चावलों की) आहुति दें। तदुपरांत अग्नि कुंड के चारों ओर पुनः छः बार जल घुमाकर अग्नि की पंचोपचार पूजा करें तथा विभूति धारण करें।

उपवास के दिन बिना पके चावल की आहुति दें। (उपवास के दिन चावल पकाए नहीं जाते; इसलिए आहुतियाँ चरू की न देकर, चावल की देते हैं।)

अत्यधिक संकट काल में केवल उदक (जल) से भी (देवताओं के नामों का उच्चारण कर ताम्र पात्र में जल छोडना), यह विधि कर सकते हैं।

यदि यात्रा में हों, तो केवल वैश्वदेव सूक्त अथवा उपरोक्त विधि के मौखिक उच्चारण मात्र से भी पंच महायज्ञ का फल प्राप्त होता है।

भूत यज्ञ (बलि हरण) :- वैश्वदेव हेतु लिए गए अन्न के एक भाग से देवताओं को बलि दी जाती है। भूत यज्ञ में बलि अग्नि में न देकर, भूमि पर रखते हैं।

नृयज्ञ अथवा मनुष्य यज्ञ :- अतिथि का सत्कार करना अर्थात् नृयज्ञ अथवा मनुष्य यज्ञ, ऐसा मनु ने (मनुस्मृति 3.70) कहा है। ब्राह्मण को अन्न देना भी मनुष्य यज्ञ है।

पंच महायज्ञ का महत्त्व :- जिस घर में पंच महा यज्ञ नहीं होते, वहाँ का अन्न संस्कारित नहीं होता; इसलिए संन्यासी, सत्पुरुष और श्राद्ध के समय पितर उसे ग्रहण नहीं करते। जिस घर में पंच महायज्ञ करने पर शेष अन्न का सेवन किया जाता है, वहाँ  गृह शाँति रहती है तथा अन्न पूर्णा देवी का वास रहता है।

दिन का समय साधना के लिए अनुकूल होने से दिन में न सोयें। 

आरोहणं गवां पृष्ठे प्रेतधूमं सरित्तटम्। बालतपं दिवास्वापं त्यजेद्दीर्घं जिजीविषुः

[स्कंदपुराण, ब्रह्म.धर्मा. 6.66-67] 

अर्थात जो दीर्घ काल तक जीवित रहना चाहता है, वह गाय-बैल की पीठ पर न बैठे, चिता का धुँआ अपने शरीर को न लगने दे, (गंगा के अतिरिक्त दूसरी) नदी के तट पर न बैठे, उदय कालीन सूर्य की किरणों का स्पर्श न होने दे तथा दिन में सोना छोड दे।

दिन और रात, इन दो मुख्य कालों में से रात के समय साधना करने में शक्ति का अधिक व्यय होता है; क्योंकि इस काल में वातावरण में अनिष्टकारी-राक्षसी-तामसिक शक्तियों का संचार बढ जाता है। इसलिए यह काल साधना के लिए प्रतिकूल रहता है। यह काल पाताल के मांत्रिकों के लिए (मांत्रिक अर्थात् बलवान आसुरी शक्ति) पोषक होता है; इसलिए सभी मांत्रिक इस तम काल में साधना करते हैं। इसके विपरीत, सात्त्विक जीव सात्त्विक काल में (दिन के समय) साधना करते हैं। दिन में अधिकाधिक साधना कर, उस साधना का रात के समय चिंतन करना तथा दिन भर में हुई चूक सुधारने का संकल्प कर, पुनः दूसरे दिन परि पूर्ण साधना करने का प्रयास करना, यह ईश्वरको अपेक्षित है। इसलिए दिनमें सोनेसे बचें।

One should avoid sleep during the day. He should not sit over the back of cows and avoid the smoke emitted out of the pyre in the cremation ground.Prayers at the river bank other than Ganga be avoided. The radiation emitted by the Sun at the time dawn be avoided.

For better understanding chapter pertaining to prayers may please be referred :: SHRADDH-HOMAGE TO MANES (1) तर्पण-श्राद्ध

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM  By :: Pt. Santosh  Bhardwaj

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