SALVATION-MOKSH मोक्ष 

Palmist, numerologist, Vastu specialist, marriage-love counsellor.

SALVATION-MOKSH मोक्ष 

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj

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नश्वरता दु:ख का कारण है। संसार आवागमन, जन्म-मरण और नश्वरता का केंद्र हैं। इस अविद्याकृत प्रपंच से मुक्ति पाना ही मोक्ष है।

संसार के दु:ख मय स्वभाव से मुक्त होने के लिये योग-समाधि, कर्म, ज्ञान या भक्ति मार्ग अपनाया जाता है। मोक्ष जीवन की अंतिम परिणति है। अज्ञान, दु:ख से मुक्त हो सकता है। इसे जीवनमुक्ति  कहते हैं। 

विदेह मुक्ति में सुख-दु:ख के भावों का विनाश हो जाता है। मनुष्य देह त्यागने के बाद आवागमन के चक्र से सर्वदा के लिये मुक्त हो जाता है। 

परमानन्द की स्थिति ही मोक्ष है। इसमें सारे द्वंद्वों का अंत हो जाता है। यह अद्वैतानुभूति की स्थिति है। अद्वेत से जो मोक्ष होता है, उसमें जड़ता-संसार से सम्बन्ध विच्छेद की मुख्यता रहती है और भक्ति से जो मोक्ष होता है, उसमें चिन्मय तत्त्व के साथ एकता की मुख्यता होती है।  

मुमुक्षु को श्रवण, मनन एवं निधिध्यासन, ये तीन प्रकार की मानसिक क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। इस प्रक्रिया में नानात्व, का जो अविद्याकृत है, विनाश होता है और आत्मा, जो ब्रह्मस्वरूप है, उसका साक्षात्कार होता है। मुमुक्षु तत्वमसि से अहंब्रह्यास्मि की ओर बढ़ता है। यहाँ आत्म साक्षात्कार ही मोक्ष है। 

जीवन मुक्ति की स्थिति में आत्मा ब्रह्म में लीन हो जाती है।

भेदान्तर के बाद प्रकृति शाँत हो जाती है और पुरुष मुक्त होकर निर्गुण रूप में समा जाता है। इसे ही कैवल्य-केवलता, अकेला रहना कहते है। जीवन के लक्ष्य में प्रकृति और पुरुष को अलग कर देना ही कैवल्य अर्थात मोक्ष है। 

प्रकृति-ब्रह्म की अपरा प्रकृति है। जीव ब्रह्म का अंश है। ज्ञान होने के बाद ब्रह्म की तरफ आरोहण होता है। विवेक उत्पन्न होने पर औपाधिक दुख सुखादि, अहंकार, प्रारब्ध, कर्म और संस्कार के लोप हो जाने से आत्मा के चितस्वरूप होकर आवागमन से मुक्त हो जाने की स्थिति ही कैवल्य है।

चित्‌ द्वारा आत्मा के साक्षात्कार से जब उसके कर्त्तृत्त्व आदि अभिमान छूटकर कर्म की निवृत्ति हो जाती है, तब विवेक-ज्ञान के उदय होने पर मुक्ति की ओर अग्रसारित आत्मा के चित्स्वरूप में जो स्थिति उत्पन्न होती है, उसकी संज्ञा कैवल्य है। 

परामात्मा में आत्मा की लीनता और न्याय के अनुसार अदृष्ट के नाश होने के फलस्वरूप आत्मा की जन्म-मरण से मुक्तावस्था को कैवल्य कहा गया है। 

जिन्होंने कर्मबंधन से मुक्त होकर कैवल्य प्राप्त किया है, उन्हें केवली कहा जाता है। बुद्धि आदि गुणों से रहित निर्मल ज्योति वाले केवली आत्म रूप में स्थिर रहते हैं। शुक देव जी, विदेह राजा जनक आदि जीवन्मुक्त थे, जो जल में कमल की भाँति, संसार में रहते हुए भी मुक्त जीवों के समान निर्लेप जीवनयापन करते थे।

मुक्ति के प्रकार ::

(1). सालोक्य :- इससे भगवद धाम की प्राप्ति होती है। वहाँ सुख-दु:ख से अतीत, अनंत काल के लिए है, अनंत असीम आनंद है। 

(2). सामीप्य :- इसमें भक्त भगवान्  के समीप, उनके ही लोक में रहता है। 

(3). सारूप्य :- इसमें भक्त का रूप भगवान् के समान हो जाता है और वह भगवान् के तीन चिन्ह :-श्री वत्स, भृगु-लता और कोस्तुभ मणी,  को छोड़कर शेष चिन्ह शंख, चक्र, गदा और पद्म आदि से युक्त हो जाता है। 

(4). सायुज्य :- इसका अर्थ है एकत्व। इसमें भक्त भगवान् से अभिन्न हो जाता है। यह ज्ञानियों को तथा भगवान् द्वारा मारे जाने वाले असुरों प्राप्त होती है। 

सार्ष्टि भी मोक्ष का ही एक अन्य रूप है, जिसमें भक्त को परम धाम में ईश्वर के समान ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता हैं। सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य, ये सभी भक्त को प्राप्त हो जाते हैं। केवल संसार की उत्पत्ति व संहार करना भगवान् के आधीन रहता है, जिसे भक्त नहीं कर सकता। 

प्रेमी-ज्ञानी भक्त भगवान् की सेवा को छोड़कर, उक्त सभी मुक्तियाँ भगवान् द्वारा दिए जाने पर भी स्वीकार नहीं करता। वह केवल भगवान् की सेवा करके, उनको सुख देना चाहता है। भक्त प्रेम का एक ही मतलब जानता है, देना, देना और देना। अपने सुख के लिए प्रेमी भक्त कोई अन्य कार्य -उपाय-उपचार नहीं करता।  

AUSPICIOUS DAILY ROUTINE शुभ दिन चर्या

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Its essential to remain fit physically, mentally, spiritually. One has to programme his life style daily routine in such a way he is able to remain healthy, happy, prosperous and devoted to the Almighty. All activities crucial-essential, momentary, unprogrammed-unscheduled constitute one’s daily routine. It may vary from one person to another depending upon the availability of time. It essential to have recreation, joy in the busy life of one.

Ancient India has been following a water tight daily routine for the Brahmns, Virtuous, pious and those who believed in scriptures. generally the enlightened, scholars, philosophers in India still follow this routine. One used to get up early in the morning around 4 o’clock, take bath and then perform rituals-prayers, self study followed by professional necessities.

प्रातः ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजे उठने से उठने से लेकर रात को सोने तक की गई गतिविधियों, क्रिया कलापों को दिनचर्या कहा जाता है। यह व्यक्ति, व्यवसाय के लिए एक समान नहीं हो सकता।  फिर भी स्वस्थ रहने के लिये मनुष्य को जीवन में एक निश्चित समय सारिणी के अनुरूप चलना चाहिये। 

मनुष्य का भोजन, गतिविधियाँ, प्रकृति के अनुरूप होने चाहियें जो कि वर्तमान समय-समाज में सम्भव नहीं हैं। अब स्त्री-पुरुष, वृद्ध व्यक्ति समान रूप से अर्जन क्रिया में जुटे हैं। लड़कों की ही तरह लड़कियाँ भी स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई कर रही हैं।  लड़कियाँ भी नौकरी, व्यवसाय में रत हैं।

During the present era-Kali Yug, its not possible for all to follow that stereo-typed routine. The job-professional requirement s forces one to wake up late till night and get up late. Those who have to perform night duties can never stick to such routine, prescribed-described in scriptures. In fact its not meant for them.

The girls are attending schools , colleges and high level training in professional carriers, which makes extremely difficult for them to stick to daily chores of domestic life. However one can make his eating habits, schedule practical enough to keep him fit.Old people are not scared of word.

ऋषि गण सूर्य गति के अनुसार ब्राह्म मुहूर्त में प्रातः विधि, स्नान और संध्या करते थे, तत्पश्चात् वेदाध्ययन और कृषि कार्य करते और रात को शीघ्र सो जाते थे; इसलिए वे शारीरिक, मानसिक, भौतिक, आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ थे। आज लोग प्रकृति के नियमों के विरुद्ध आचरण करते हैं। इससे उनका शारीरिक स्वास्थ्य बिगड गया है। पशु-पक्षी भी प्रकृतिके नियमों के अनुसार अपनी दिनचर्या व्यतीत करते हैं।

The schedule of the sages is a model, but practically difficult to follow-adopt. It can keep one free from poverty, troubles-tensions.

धर्म शास्त्र में नियमित-नियम बद्ध आह्निक को प्रधानता दी है। इससे शरीर, मन, मनो विकृतियाँ, दरिद्रता, दुर्व्यसन, आपत्तियों काबू हैं। 

Daily practice of rituals-prayers, keeps the psyche of one stable-pure. The Brahmn has to perform two prayers, the first in the morning and the second in the evening, with the recitation of Gayatri Mantr. It keep his psyche pure. he remain devoted to the God.

नित्य कर्म मन-चित्त को शुद्ध करते है। ब्राह्मण को दोनों  संध्याएँ नियमित रूप  से गायत्री मंत्र का जप करके करनी चाहियें।  

India has a loosely caste-creed-more-hereditary based society; constituting of Brahmns, Kshtriy, Vaeshy and the Shudr. The physique, mental ability, working capability, habits are more or less determined by the gens-chromosomes DNA present in the individual.

As per tradition the Brahmn perform teaching and learning. The Kshtriy resort to protection of society. The Vaeshy serves the society by trading and agriculture. The Shudr provides all sorts of services to the society. As per definition of Shudr and one who is in service is a Shudr.

ब्राह्मणका नित्य कर्म-कर्तव्य है, अध्ययन और अध्यापन (अध्यात्म सीखना और सिखाना) क्षत्रियका नित्य कर्म-कर्तव्य है, दुर्जनों से समाज की रक्षा करना वैश्य का नित्य कर्म-कर्तव्य है, गौ-पशु पालन, कृषि और व्यापार द्वारा समाज की सेवा करना शूद्र का नित्यकर्म-कर्तव्य है, ब्राह्मण और क्षत्रिय के विशिष्ट व्यवसाय के अतिरिक्त कोई भी व्यवसाय करना।

The celibate has to serve his teacher and gain knowledge. He has to learn to be a socially useful person. He has to follow a rigid-tight schedule, under the supervision of the teacher in his Ashram-residence cum school, hermitage away form residential colonies. The household has to resort to earning, serving the society, nourish-nurture his family, pray to God, offer food to the guest, celibates & their teachers family. Retired life has to be spent in gaining virtues, learning, purification of body, mind and the soul.The hermit-recluse has to beg for his living, pray to God, resort to asceticism.

ब्रह्मचर्याश्रम में धर्म का पालन कैसे करें, इसका अभ्यास करना; गृहस्थाश्रम में देव, ऋषि, पितर और समाज ऋण चुकाना; वानप्रस्थाश्रममें शरीर शुद्धि और तत्त्वज्ञान के अभ्यास के उद्देश्य से साधना करना तथा संन्यासाश्रम में भिक्षाटन, जप, ध्यान इत्यादि कर्म करना, ऐसे नित्यकर्म बताए गए हैं।

The household divides the 12 hours during the day in 5 components. In the morning he resort to prayers. Time between noon and morning is used for earning livelihood. During the noon he perform rituals, prayers and sacrifices in holy fire. The full length of 24 hours is divisible in 30 sub components called Muhurt-auspicious time (48 minutes) for beginning some thing-event. 

The early morning session starts with becoming fresh and taking bath. One has to avoid Sun rise view. After the Sun rise morning prayers and rituals begin. It involves recitation of Gayatri Mantr and the worship of the deities-Almighty. The prayers include Panch Maha Yagy.

The period between the noon and the morning after prayers is utilized for earning livelihood, agriculture, crops, dairy-farming etc.

The middle segment of the day include bathing-washing hands, feet-legs and mouth, recitation of auspicious Mantr, Brahm Yagy and Bhut Yagy in addition to prayers.

Afternoon prayers include Pitre Yagy-homage to Manes & charity.

The evening session include recitation of Gayatri Mantr, listening -reading Purans, scriptures etc.

This is not enough. One has to perform atonement-penance to get rid of the sins of killing insects, worms, small living beings unknowingly.

दिन के (12 घंटों के) पांच विभाग हैं :– प्रत्येक विभाग तीन मुहूर्त के समान होता है। 24 घंटों के दिन में 30 मुहूर्त होते हैं। एक मुहूर्त अर्थात् दो घटिका अर्थात् 48 मिनट। संक्षेप में प्रत्येक विभाग 2 घंटे 24 मिनट का होता है। 

प्रातः काल (सूर्योदय से आरंभ) :- संध्यावंदना, देवता पूजन और प्रात: र्वैश्वेदेव। 

संगव काल :- संगव काल (दिन का 7 से 12 घटिका काल (दुग्ध दोहन काल) उप जीविका के साधन। 

मध्याह्न काल :- मध्याह्न स्नान, मध्याह्न संध्या, ब्रह्म यज्ञ और भूत यज्ञ। 

अपराह्न काल :-  पितृ यज्ञ (तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध इत्यादि)  और 

सायाह्न काल :- पुराण श्रवण तथा उस पर चर्चा करना और सायं वैश्वदेव और संध्या।

पंच महायज्ञ :-

अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम्। होमोदैवोबलिर्भौतोनृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥ 

शिष्य को शिक्षित करना (अध्यापन), ब्रह्मयज्ञ; पितरोंको तर्पण, पितृयज्ञ; वैश्वदेव-देवयज्ञ; बलि प्रदान-भूत यज्ञ तथा अतिथि पूजन-मनुष्य यज्ञ है।

ब्रह्म यज्ञ :: वेदों का अध्ययन (अर्थात् स्वाध्याय) तथा देवता और ऋषियों का तर्पण-ब्रह्म यज्ञ है।

पितृ यज्ञ :: पितरों को तर्पण करना (जिन ऋषियों की पूर्वजों में गणना की गई है :- सुमंतु, जैमिनी, वैशंपायन जैसे ऋषियों के तथा अपने पूर्वजों के नाम पर जल देने की विधि)

देव यज्ञ :: वैश्वदेव, अग्निहोत्र और नैमित्तिक यज्ञ देव यज्ञके भाग हैं।

नित्य होने वाली पंच सूना-जीव हिंसा के प्रायश्चित स्वरूप वैश्वदेव करना। नित्य उप जीविका करते समय मनुष्य द्वारा अनजाने में होने वाली जीव हिंसा को शास्त्र में पंचसूना कहा गया है।

वैश्वदेवः प्रकर्तव्यः पन्चसूनापनुत्तये। कण्डनी पेषणी चुल्ली जलकुम्भोमार्जनी॥[धर्म सिंधु]

कूटना, पीसना, चूल्हे का उपयोग करना, पानी भरना तथा बुहारना, ये पांच क्रियाएं करते समय सूक्ष्म जीव जंतुओं की हिंसा अटल है। इस हिंसा को ‘पंच सूना’ जीव हिंसा कहते हैं। ऐसी हिंसा हो जाए, तो ध्यानपूर्वक ‘वैश्वदेव’ प्रायश्चित का अंगभूत कर्म नित्य करें। उक्त हिंसा के परिणाम स्वरूप मनुष्य के मन पर हुआ पाप संस्कार दूर होता है।

वैश्वदेव विधि :: अग्नि कुंड में ‘रुक्मक’ अथवा ‘पावक’ नामक अग्नि की स्थापना कर अग्नि का ध्यान करें। अग्नि कुंड के चारों ओर छः बार जल घुमाकर अष्ट दिशाओं को चंदन-पुष्प अर्पित करें तथा अग्नि में चरु की (पके चावलों की) आहुति दें। तदुपरांत अग्नि कुंड के चारों ओर पुनः छः बार जल घुमाकर अग्नि की पंचोपचार पूजा करें तथा विभूति धारण करें।

उपवास के दिन बिना पके चावल की आहुति दें। (उपवास के दिन चावल पकाए नहीं जाते; इसलिए आहुतियाँ चरू की न देकर, चावल की देते हैं।)

अत्यधिक संकट काल में केवल उदक (जल) से भी (देवताओं के नामों का उच्चारण कर ताम्र पात्र में जल छोडना), यह विधि कर सकते हैं।

यदि यात्रा में हों, तो केवल वैश्वदेव सूक्त अथवा उपरोक्त विधि के मौखिक उच्चारण मात्र से भी पंच महायज्ञ का फल प्राप्त होता है।

भूत यज्ञ (बलि हरण) :- वैश्वदेव हेतु लिए गए अन्न के एक भाग से देवताओं को बलि दी जाती है। भूत यज्ञ में बलि अग्नि में न देकर, भूमि पर रखते हैं।

नृयज्ञ अथवा मनुष्य यज्ञ :- अतिथि का सत्कार करना अर्थात् नृयज्ञ अथवा मनुष्य यज्ञ, ऐसा मनु ने (मनुस्मृति 3.70) कहा है। ब्राह्मण को अन्न देना भी मनुष्य यज्ञ है।

पंच महायज्ञ का महत्त्व :- जिस घर में पंच महा यज्ञ नहीं होते, वहाँ का अन्न संस्कारित नहीं होता; इसलिए संन्यासी, सत्पुरुष और श्राद्ध के समय पितर उसे ग्रहण नहीं करते। जिस घर में पंच महायज्ञ करने पर शेष अन्न का सेवन किया जाता है, वहाँ  गृह शाँति रहती है तथा अन्न पूर्णा देवी का वास रहता है।

दिन का समय साधना के लिए अनुकूल होने से दिन में न सोयें। 

आरोहणं गवां पृष्ठे प्रेतधूमं सरित्तटम्। बालतपं दिवास्वापं त्यजेद्दीर्घं जिजीविषुः

[स्कंदपुराण, ब्रह्म.धर्मा. 6.66-67] 

अर्थात जो दीर्घ काल तक जीवित रहना चाहता है, वह गाय-बैल की पीठ पर न बैठे, चिता का धुँआ अपने शरीर को न लगने दे, (गंगा के अतिरिक्त दूसरी) नदी के तट पर न बैठे, उदय कालीन सूर्य की किरणों का स्पर्श न होने दे तथा दिन में सोना छोड दे।

दिन और रात, इन दो मुख्य कालों में से रात के समय साधना करने में शक्ति का अधिक व्यय होता है; क्योंकि इस काल में वातावरण में अनिष्टकारी-राक्षसी-तामसिक शक्तियों का संचार बढ जाता है। इसलिए यह काल साधना के लिए प्रतिकूल रहता है। यह काल पाताल के मांत्रिकों के लिए (मांत्रिक अर्थात् बलवान आसुरी शक्ति) पोषक होता है; इसलिए सभी मांत्रिक इस तम काल में साधना करते हैं। इसके विपरीत, सात्त्विक जीव सात्त्विक काल में (दिन के समय) साधना करते हैं। दिन में अधिकाधिक साधना कर, उस साधना का रात के समय चिंतन करना तथा दिन भर में हुई चूक सुधारने का संकल्प कर, पुनः दूसरे दिन परि पूर्ण साधना करने का प्रयास करना, यह ईश्वरको अपेक्षित है। इसलिए दिनमें सोनेसे बचें।

One should avoid sleep during the day. He should not sit over the back of cows and avoid the smoke emitted out of the pyre in the cremation ground.Prayers at the river bank other than Ganga be avoided. The radiation emitted by the Sun at the time dawn be avoided.

For better understanding chapter pertaining to prayers may please be referred :: SHRADDH-HOMAGE TO MANES (1) तर्पण-श्राद्ध

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM  By :: Pt. Santosh  Bhardwaj

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SANT RAVI DASS संत रविदास

A faith healer, psychoanalyst, and marriage-love counsellor.

SANT RAVI DASS संत रविदास

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM  By :: Pt. Santosh Bhardwaj  

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पूरा नाम :- रविदास, जन्म स्थान :- कांशी (बनारस), पिता का नाम :- संतोख दास, माता का नाम :- कालसी।

रविदास जी 15 और 16 वी शताब्दी में भक्ति अभियान के उत्तर भारतीय आध्यात्मिक संत कवि  थे। उनके भक्ति गीतों ने भक्ति अभियान पर एक आकर्षक छाप छोड़ी। वे एक सामाजिक सुधारक और आध्यात्मिक व्यक्ति भी थे। उनके भक्ति गीतों में सिक्ख साहित्य, गुरु ग्रन्थ साहिब शामिल है। पञ्च वाणी की दादूपंथी परंपरा में भी उनकी अनेक रचनाएँ शामिल हैं।

बचपन से ही उन्हें भक्ति और भगवान की पूजा में रूचि थी। उन पर संत-कवि रामानंद का भी प्रभाव पड़ा। उनकी भक्ति से काशी राज भी प्रभावित हुए थे। वे वैश्विक बंधुता, सहिष्णुता, पड़ोसियों के लिये प्यार और देशप्रेम का पाठ पढ़ाते थे। 

Sant Ravi Das was a cobbler of 15th century Varanasi belonging to the Nirgun Sant Tradition. He is remembered for his beautiful hymns and his gentle piety which drew many seeking souls to his shoe shop.

PIETY :: शील, धार्मिकता, पुण्यशीलता, धर्मनिष्ठा, साधुता, पुण्यात्मा होने का गुण, धर्मनिष्ठता, ईश्वर भक्ति; godliness, devotion, morality, righteousness, religiosity,  religiousness, devoutness, modesty,  politeness, humbleness, moral conduct.

He was a born Shudr from the  Chamar caste. All his devotional songs were included in the Sikh holy book, the Adi Granth, by the fifth Sikh Guru Arjun Dev. There is also a larger body of hymns passed on independently that is claimed and attributed by some to Ravi Das. He was subversive in that his devotionalism implied a levelling of the social divisions of caste and gender, yet ecumenical in that it tended to promote crossing of sectarian divides in the name of a higher spiritual unity. He taught that one is distinguished not by one’s caste (Jati-जाति) but by one’s actions (Karm-actions) and that every person has the right to worship God and read holy texts.

बांधू न बंधन छांऊं न छाया, तुमहीं सेऊं निरंजन राया। 

चरन पताल सीस असमांना, सो ठाकुर कैसैं संपटि समांना। 

सिव सनिकादिक अंत न पाया, खोजत ब्रह्मा जनम गवाया। 

तोडूं न पाती पूजौं न देवा,सहज समाधि करौं हरि सेवा। 

नख प्रसेद जाकै सुरसुरी धारा, रोमावली अठारह भारा। 

चारि बेद जाकै सुमृत सासा, भगति हेत गावै रैदासा।

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।

रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।

तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।

हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।

दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।

कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।

तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।

कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।

वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।

जब भक्त रविदास को कंगन देने प्रकट हुईं गंगा मैया :: संत और फकीर जो भी इनके द्वार पर आते उन्हें बिना पैसे लिये अपने हाथों से बने जूते पहनाते। इनके इस स्वभाव के कारण घर का खर्च चलाना कठिन हो रहा था। इसलिए इनके पिता ने इन्हें घर से बाहर अलग रहने के लिए जमीन दे दिया। जमीन के छोटे से टुकड़े में रविदास जी ने एक कुटिया बना लिया। जूते बनाकर जो कमाई होती उससे संतों की सेवा करते इसके बाद जो कुछ बच जाता उससे अपना गुजारा कर लेते थे। 

sant ravidas ganga story एक दिन एक ब्राह्मण इनके द्वार आये और कहा कि गंगा स्नान करने जा रहे हैं एक जूता चाहिए। इन्होंने बिना पैसे लिया ब्राह्मण को एक जूता दे दिया। इसके बाद एक सुपारी ब्राह्मण को देकर कहा कि, इसे मेरी ओर से गंगा मैया को दे देना। ब्राह्मण रविदास जी द्वारा दिया गया सुपारी लेकर गंगा स्नान करने चल पड़ा। गंगा स्नान करने के बाद गंगा मैया की पूजा की और जब चलने लगा तो अनमने मन से रविदास जी द्वारा दिया सुपारी गंगा में उछाल दिया। तभी एक चमत्कार हुआ गंगा मैया प्रकट हो गयीं और रविदास जी द्वारा दिया गया सुपारी अपने हाथ में ले लिया। गंगा मैया ने एक सोने का कंगन ब्राह्मण को दिया और कहा कि इसे ले जाकर रविदास को दे देना। 

ब्राह्मण भाव विभोर होकर रविदास जी के पास आया और बोला कि आज तक गंगा मैया की पूजा मैंने की लेकिन गंगा मैया के दर्शन कभी प्राप्त नहीं हुए। लेकिन आपकी भक्ति का प्रताप ऐसा है कि गंगा मैया ने स्वयं प्रकट होकर आपकी दी हुई सुपारी को स्वीकार किया और आपको सोने का कंगन दिया है। आपकी कृपा से मुझे भी गंगा मैया के दर्शन हुए। इस बात की ख़बर पूरे काशी में फैल गयी। रविदास जी के विरोधियों ने इसे पाखंड बताया और कहा कि अगर रविदास जी सच्चे भक्त हैं तो दूसरा कंगन लाकर दिखाएं। 

विरोधियों के कटु वचनों को सुनकर रविदास जी भक्ति में लीन होकर भजन गाने लगे। रविदास जी चमड़ा साफ करने के लिए एक बर्तन में जल भरकर रखते थे। इस बर्तन में रखे जल से गंगा मैया प्रकट हुई और दूसरा कंगन रविदास जी को भेंट किया। रविदास जी के विरोधियों का सिर नीचा हुआ और संत रविदास जी की जय-जयकार होने लगी। इसी समय से यह दोहा प्रसिद्ध हो गया। ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’ 

INITIATION OF RAM DASS INTO EDUCATION :: Pt. Sharda Nand used to run his Pathshala-school in his house. Ravi Dass was admitted in Pt. Sharda Nand’s School by his revered parents. Many casteist people tried to restrain Pt. Sharda Nand from admitting in his Pathshala and teaching Ravi Dass–a Shudr-low caste boy. Pt. Sharda Nand was a wise man. He realized from the face of Ravi Dass he was a gifted child. In utter disregard of the pressure of casteist people, Pt. Sharda Nand admitted Guru Ravi Dass and started teaching him. He was a sober and promising student. When he taught him the letters of alphabet, Ravi Dass Ji expanded and spoke poetic lines, originating from  “ॐ-OM” , signifying Glory of God.

All this had great influence on Pt. Sharda Nand Ji. He realized that boy Ravi Dass was spiritually enlightened since beginning. Although Ravi Dass Ji was still a boy, yet Pt. Sharda Nand had developed deep affection for student him.

REVIVING GURU’S SON :: Ravi Dass became intimate with the son of Pt. Sharda Nand. They used to play together. One day in the game of hide-and-seek, Ravi Dass won and his friend lost the game. As a result, his friend was to seek hidden. Ravi Dass had to hide in his next turn. By now night had fallen. It was mutually agreed that the friend (son of Pt. Sharda Nand) would play his turn of seeking Guru Ravi Dass the next morning. Next morning, Ravi Dass, along with other play-mates, waited for his friend for a long time but he did not turn up. At last Ravi Das himself went to his residence with other play-mates.The parents and other members of family of Pt. Sharda Nand Ji were weeping.

The neighbours and others were also sitting in remorse (contrition, deep regret, repentance, penitence, guilt, feelings of guilt, bad/guilty conscience, compunction, remorseful, ruefulness, contriteness, sorrow, shame, self-reproach, self-accusation, self-condemnation; pangs of conscience). Ravi Dass enquired as to what had happened. He was apprised that his friend (son of Pt. Sharda Nand) had died during night. Ram Dass wondered as to why he had died with-out playing his turn of seeking Ram Dass in the game of hide-and-seek. He desired to see his friend.

Pt. Sharda Nand took Guru Ravi Dass along to the place where dead body of his son was lying. In a friendly tone, Ravi Dass asked his friend that it was not the time to sleep and he should get up and play his turn of seeking him in the game of hide-and-seek. By virtue of spiritual powers of Ravi Dass  his friend became alive. He got up and was willing to play. His parents and others were astonished.They were happy again.

SURVIVING ONSLAUGHT BY MISGUIDED-IGNORANT :: Since his childhood, he had a religious bent of mind. He started worshipping God like the Brahmans. He blew conch-shell, applied Tilak (mark) on fore head, wore Janju (sacred thread) and tied Dhoti (cloth sheet used instead of trousers) like the Brahmans. He vehemently condemned caste system and untouchability. He preached equality, secularism, truthfulness, oneness of God and human rights. Since his message was of universal brotherhood, people of all shades irrespective of caste, sex or creed came to listen his sermons. His following was fast increasing. Some disgruntled people planned to kill Ravi Dass. He was invited at a secluded place where he was mercilessly attacked and killed. What really happened was under the cast of a spell. The attackers killed their leader in stead of him.

PROTECTION OF FRIEND FROM A LION JUST BY PRESENCE :: Ram Lal was a close friend of Ravi Dass. For most of the time they remained and played together. He loved Ram Dass very much. The Brahmans were jealous and could not tolerate that a Brahman boy should play with an untouchable. They emphatically impressed upon his parents to detract their son from moving and playing with a boy of low-caste. But Ram Lal obeyed none.The Brahmans, being jealous of Ravi Dass complained to the king about the friendship of Ram Lal (a Brahman) and Ravi Dass-an untouchable. The king called Ram Lal to the court. He decided to kill by throwing him before a hungry lion. As such, he was thrown before a hungry lion. The lion thundered. Ram Lal cried at his high pitch and fainted. When the lion came near the boy it became calm. It looked around. Instead of killing the boy, it looked around and saw Ravi Dass sitting near by. The lion bowed before Ram Lal and receded. Ram Lal came to senses.  The King and Brahmans felt ashamed. The King realised that Ram Lal has been protected by some spiritual power. The king freed him.

REFUSAL TO ACCEPT PHILOSOPHER’S STONE (पारस पत्थर) :: Ravi Dass  preferred to lead a poor man’s life. Many kings and queens and other rich people were his disciples but he never expected and accepted costly offers. A sage visited Ram Dass’s hut and offered him a philosopher’s stone capable of turning iron into gold.  Ram Dass refused to accept and said that it was of no use for him. The saint requested to keep it with him till he returned from a pilgrimage. He went away and returned after an year and asked for the stone. Ravi Dass asked to collect the stone from the place where he kept it. The saint became very happy and blessed him with Adhyatm-spiritual knowledge.

FLOATING OF STATUE OF THAKUR-SHRI HARI :: There are numerous instances when astray (पथ भ्रष्ट; aberrant, pervert, debauched, depraved, deviant, deviate, errant, fallen, immoral, misguided, perverse, perverted, reprobate, roguish, stray, aberrant) Brahmns of previous birth were given opportunity by the Almighty to improve their deeds in present birth and show right direction to the society, like the Butcher who gave lessons in enlightenment to Kapil Muni, incarnation of Bhagwan Shri Hari Vishnu.

Ravi Dass seems to belong to this category. He was a cobbler-shoe maker-Chamar by caste. Manu Smrati do not give credence to caste by birth, it stresses over the Karm-deeds, not the profession. There are again numerous examples where one born in an inferior Varn-caste has improved to higher Varn. Dev Rishi Narad & Mahrishi Balmiki were from inferior Varn in their previous births. Dev Rishi was punished by Brahma Ji for singing untuned-without rhythm.

Born and brought up in an environment dedicated to the Almighty the previous birth showed up also started worship of God. He started blowing conch-shell and ringing the bell. He was enlightened and had acquired Bhakti Yog. He simplified mode of worship and discarded rituals. His religious discourses were most convincing and truthful. As a result, cutting across caste barriers, large number of people became his followers. This was a phase when the impact Buddhism distracted Brahmns and they became impostors (पाखंडी, ढोंगी, छली, वेद विरुद्ध आचरण करनेवाला, वेद–निंदक). All this irked the ignorant-stupid Brahmans. It was a challenge not only to their priestly supremacy but an adverse impact on their source of livelihood also. Brahmans forbade him from worshipping God. But he did not relent and continued worship. At last Brahmans approached the then Kashi Naresh Hardev Singh and complained against Ravi Dass for practising worship of God. Ravi Dass was summoned to appear in the court of the king. He explained in the court that worship was everybody’s right and that he was the truthful worshipper of God. The Pandit priests and Ravi Dass were asked to bring their Thakur (Idol) whom they worshipped, to the river Ganga on the appointed day. Only that party would be adjudged as the true worshipper whose Thakur would float in the river. Brahman priests and Ravi Dass arrived at Raj Ghat of the river Ganga as directed by the king. The Pandits had brought small Thakur idols-figurines wrapped in the cotton. But Ravi Dass was stoutly carrying a 40 kg. heavy-weight square stone on his shoulders with unshakeable confidence. A huge crowd of residents of Banaras gathered on Raj Ghat of river Ganga to witness the fateful and decisive event. The king and the courtiers also reached the spot. The Brahman priests who were the aggrieved party were given first turn to float their Thakur stones in the river. All the tall fleshy, head shaven, Janju (thick thread) wearing and Tilak applied Brahman priests blew conch-shells and fumbled Vedic Mantr and gently placed their Thakur stones in the river one by one. To their great dismay, all their Thakur Ji’s idols-statues gently sank down deep into the water. All of them bowed down their heads. The onlookers were stunned to see the sinking Thakurs of Brahmans. Then was the turn of Ravi Dass. He lifted his heavy-weight stone idol on his shoulders. There was thaw. All eyes were focused on Ravi Dass and the stone he carried. Curiosity prevailed. It was a decisive moment. In case his stone also sinks, there will be further gloom for the lowly. He closed his eyes and stood erect. His face blushed and with all humility he prayed to God.

Meri sangat poch soch din raati Mera karam kutilta janam kubhati.

Raam gosaeeaa jeea ke jeewnaa Mohi naa bisaarho main jan tera. (Rahaao)

Meri haro vipt jan karo subhaaieeCharn naa chhadoo sareer kall jaaiee.

Kaho Ravidass pario teri saabha. Beig milho jan karu naa bilanbaa.

At this moment there was dazzling light in the sky. All the onlookers expected something miraculous. Ravi Dass moved ahead to the water and gently placed the stone in light-blue transparent water of the river. To great astonishment of the onlookers the statue floated majestically. Ravi Dass gently smiled and thanked God for coming to his rescue. There was spontaneous applause from the viewers. The Pandits had failed in the test. They had been proved false worshippers. The onlookers made a mockery of the Pandits. The king announced victory to Guru Ravi Dass  as the truthful worshipper. 

 

 

NARAYAN GURU नारायण गुरु

A faith healer, psychoanalyst, and marriage-love counsellor.

NARAYAN GURU नारायण गुरु

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj 

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श्री नारायण गुरु का जन्म केरल के तिरुअनंतपुरम के उत्तर में 12 किलोमीटर दूर एक छोटे से गाँव में सन 1856 में हुआ था। स्वयं पिछड़ी जाति के होने के कारण वे इस समुदाय के दुःख दर्द को समझते थे। इन का घर का नाम नानु था। ये बचपन से ही बहुत नटखट थे।

इनकी प्रारम्भिक शिक्षा उस समय के प्रसिद्ध ज्योतिषी सीए पिल्लै के पास हुई। इनसे इन्होंने संस्कृत की शिक्षा ग्रहण की। गाँव में इस से अधिक शिक्षा का कोई साधन नहीं था। अतः ये वहाँ से प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण कर अपने घर में ही रह कर स्वाध्याय करने लगे। इन की लगन देख कर इन के चाचा श्री कृष्णनवैदियार ने इन्हें पढ़ाने का दायित्व ले लिया।

थोड़ा बड़ा होने पर इन्होंने गांव के पशुओं को चराने की जिम्मेवारी ले ली। जब ये गायों को चराने के लिए जंगल में जाते और देखते की गायें आराम से चारा चार रही हैं अथवा जुगाली कर रही हैं तो ये स्वयं एक तरफ बैठकर संस्कृत श्लोक याद करते रहते। बाद में इन्हें खेतों में हल चलाने का काम मिल गया ।

खेतों में काम करते समय भी जब इन्हें समय मिलता तो ये जीवन के रहस्यों, उन के कारणों, और निराकरण के उपाय ढूँढ़ते रहते । मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? यह जीवन क्या है ? कितने दिनों के लिए है ? कहाँ से आता है ? कहाँ जाता है ? संसार में दुःख क्यों है ? सुख क्या है ? इस तरह के प्रश्न सदा ही इन्हें विचलित करते रहते ।

बड़े होने पर इन्होंने आस पास के अपने समकक्ष बच्चों को लिखना पढ़ना सिखाना शुरू किया। तब ये नानूअशान (नानू अध्यापक) के नाम से प्रसिद्ध हो गए। रहने के लिए इन्हें पास के ही ज्ञानेश्वरम मंदिर के परिसर में जगह मिल गई। तब इन्होंने मंदिर में श्रीमद्भगवतगीता का अध्यापन शुरू किया।

नारायण गुरु का विश्वास था कि भक्ति की शिक्षा प्रस्थानत्रयी अर्थात वेदान्त सूत्र, उपनिषद् और गीता से ही मिलती है। वेद का प्रतिपाद्य विषय कर्म था। उपनिषदों ने इस में ज्ञान का पुट मिलाया और भक्ति जनता के स्तर से उठकर ऊपर पहुंची। इन तीनों का समन्वय गीता में किया गया।

इस में कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग की बात कही गई। गीता का समन्वय मूलक ही इस की मौलिकता है। शंकराचार्य ने गीता के इसी सिद्धान्त का प्रचार प्रसार करते हुए अद्वैतवाद की स्थापना की थी। श्री नारायण गुरु ने इसी को अपने दर्शन में नए रूप में प्रस्तुत किया।

उन का बल गीता के संदेशों पर अधिक था। वे न तो कठोर कर्मकाँड़ी थे और न ही कट्टर वेदांती। वे कभी सन्यास लेकर जंगलों में जा कर नहीं रहे। उन का विश्वास आसक्ति रहित कर्म करने में था। उन्होने अपने ‘आत्मोपदेशक शतक’ में बार बार यही कहा कि ज्ञान प्राप्ति ही सब कुछ नहीं है।

ज्ञान का अर्थ है आत्म निरीक्षण अर्थात आपने अंदर झांक कर देखना, स्वयं को पहचानना और अपने स्व कि अनुभूति करना – यही वास्तविक ज्ञान है। श्री नारायण गुरु का जीवन दर्शन मुख्यतः तीन भागों में देखा जा सकता है।

पहला है एक भक्त का, एक ऐसा भक्त जो संसार के दैनिक झगड़ों टंटों से दूर, शांति प्रद स्थानों पर, जंगलों में, पर्वतों की कन्दराओं में, सुनसान धीमी बहती नदी के तट पर अथवा इसी प्रकार के निर्जन स्थानों पर सत्य को ढूँढ़ता रहता है।

दूसरा भाग जब मनुष्य एक तपस्वी हो जाता है, एक वास्तविक योगी बन जाता है। कर्मण्येवाधिकारर्स्ते मा फलेषूकदाचन-जब वह गीता के इस सूत्र को अपना धर्म मान लेता है।

तीसरा भाग वह है जब वह वास्तविक रूप से कर्म में विश्वास रखते हुए संसार के मोह माया से हट कर एक ज्ञानी बन जाता है। लेकिन उसे समाज की आवश्यकता अथवा समाज की गतिविधि का भी ज्ञान रहता है। यह एक धर्म प्राण बौद्धिक का रूप है।

नारायण गुरु की रचनाओं में मनुष्य केइन तीनों रूपों की झलक है। उनके काव्य में भक्ति भाव की प्रधानता है ही साथ में मनुष्य की आंतरिक हृदय की दिव्य ज्योति की भी सुगंध है। ‘अनुभूमि दशकम’‘अद्वैत दीपिका’ तथा ‘स्वानुभूति गीति’ में इसी दिव्य ज्योति का आभास मिलता है। ‘

कुंडलिनी पटटू’ नाम की काव्य रचना में पातंजलि ऋषि के योग साधना के छह सोपानों की चर्चा की गई है। उनकी अन्य रचनाएँ हैं – दर्शन माला, आत्मोपदेश शतकम, दैव दशकम, आदि। श्री नारायण गुरु आचार्य शंकर के अद्वैतवाद में विश्वास रखते थे लेकिन एक अंतर के साथ।

आचार्य शंकर ने अद्वैत दर्शन को विश्व में भारत के एक विशेष आध्यात्मिक योगदान के रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रकार उन्होंने देश में अपने मत अवलंबियों का एक बौद्धिक वर्ग बना दिया।

श्री नायन गुरु ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया लेकिन इसे मूलतः दीन, हीन, संत्रस्त, तथा पीड़ित जन साधारण के हित को ध्यान में रख कर।

श्री नारायण गुरु के जीवन के साथ अनेक चमत्कारिक कहानियां जुड़ी हुई है। इन में कुछ अतिशयोक्ति भी हो सकती हैं। इस तरह की चमत्कारिक कहानियों को स्वयं नारायण गुरु ने नकारा है। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी हैं जो वास्तविक होते हुए भी चमत्कार से कम नहीं। एक बार नारायण गुरु अपने शिष्य कुमारन आसन के अरुविपुरम में ठहरे थे। वे किसी के घर में न रहकर बाहर खुले आसमान के नीचे आग जलाकर रात्रि बिताना अधिक पसंद करते थे।

इस रात भी दोनों गुरु और शिष्य एक पेड़ के नीचे आग जला कर बैठे थे। थोड़ी देर बाद नारायण गुरु ध्यान में बैठ गए और आसन कंबल ओढ़ कर पास ही जमीन पर सो गए। थोड़ी देर बाद गुरु ने एक हल्की सी डंडी से शिष्य को जगा कर धीरे से कहा ‘देखो’।

आसन ने देखा कि पास में ही एक चीता और उस का बच्चा आग के दूसरी तरफ बैठे हैं। गुरु जी ने कहा ,‘डरो मत चुप चाप सो जाओ। ये हमें कुछ नहीं कहेंगे’। आसन स्वयं को अच्छी तरह कंबल से लपेट कर सो गया। थोड़ी देर बाद जब आसन कि आँख खुली तो उस ने देखा कि दोनों जानवर जा चुके हैं। इस तरह की अनेक घटनाओं की चर्चा स्वयं नारायण गुरु के अन्य शिष्यों ने भी की है।

नारायण गुरु जीवन के तीस वर्षों तक यायावर की भांति इधर से उधर घूमते रहे। रात हो या दिन, कभी इस स्थान पर तो कभी उस स्थान पर, कभी समुद्र तट पर तो कभी पर्वतों पर, कभी वन प्रांतरों में तो कभी कन्दराओं में, कभी ध्यानावस्थित तो कभी विचार विमर्श में लीन।

विद्वानों ने इन्हें गीता के ‘अनिकेत स्थितप्रज्ञ’कहा। इन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया – समाज से अशिक्षा, अज्ञानता,अंधविश्वास, भ्रष्टाचार, दकियानूसी रीति रिवाज और रूढ़िवादिता का उन्मूलन। स्वामी जी हृदय से अत्यंत दयालु, शान्त और सरल स्वभाव के थे लेकिन साथ ही इच्छा शक्ति में धृढ़ और संकल्पशील थे। इन्होंने अनेक छात्रों को संस्कृत और विज्ञान पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।

मुख्य उद्देश्य था – समाज में चेतना जागृत करना। इन का जीवन दर्शन शाश्वत मूल्यों पर आधारित था इस लिए इन्हें एक व्यावहारिक योगी माना जाता है।श्री नारायण गुरु अपनी जीवन पद्धति और क्रिया कलापों के कारण एक शुद्ध,सात्विक और सरल वेदांती थे। आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में अंतर्विरोध और पारस्परिक विरोध के रूप में अवरोध तो आते ही हैं। ये नारायण गुरु के सामने भी आए।

इस पर स्वामी जी ने कुछ सूत्र बना रखे थे –

(1)“सभी धर्मों का लक्ष्य एक है। एक बार जब सभी नदियाँ सागर में मिल जाती हैं तो सब के अंतर समाप्त हो जाते हैं।“

(2)“धर्म का उद्देश्य है मनुष्य के विचारों को शिखर तक ले जाना।“

(3)“जिस व्यक्ति ने अंतिम सत्य का अनुभव कर लिया, उसे फिर किसी धर्म की आवश्यकता नहीं होती। वह अन्य लोगों के लिए पथ प्रदर्शक बन जाता है।“

नारायण गुरु ने अपने कार्यकर्मों और उपदेशों द्वारा केरल की दमित और दलित वर्ग के लोगों में आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता पैदा की। इन के प्रयत्नों के परिणाम स्वरूप 1925 में केरल में दलित और दमित जाति के लिए वहाँ के मंदिरों के द्वार खोल दिये गए।

1936 में इस संबंध में कानून भी पारित कर दिया गया। पहले इन वर्गों के बच्चों पर सामान्य स्कूलों में पढ़ने पर प्रतिबंध था। नारायण गुरु के प्रयत्नों से स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले ही यह प्रतिबंध हट गया ।

फरवरी 1928 में स्वामी जी अचानक अस्वस्थ हो गए। इन को आभास हो गया कि अब इनका अंतिम समय आ गया है। अंत में 20 सितंबर 1928 को 72 वर्ष कि आयु में वे महा समाधि में लीन हो गए।

SANT NAMMALVAR (SHATHKOP) सन्त नम्मालवार (शठकोप)

A faith healer, psychoanalyst, and marriage-love counsellor.

SANT NAMMALVAR (SHATHKOP) सन्त नम्मालवार (शठकोप)

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj 

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सत्य एक ही है लेकिन सन्त नम्मालवार के अनुसार उस के दो पक्ष हैं :– सर्वव्यापकता और असीमितता।

एक साधारण व्यक्ति सत्य को तीन रूपों में देखता है – मानव, जगत और ब्रह्म। मानव और जगत तो भौतिक रूप में आप के सामने मौजूद हैं लेकिन ब्रह्म इन दोनों के अंदर है और ये दोनों इस ब्रह्म में समाये हैं। सन्त नम्मालवार एक तत्व ज्ञानी और रहस्यवाद के दार्शनिक थे। वे सदैव प्रभु की खोज में लीन रहते थे।

उनकी जन्म–मृत्यु तिथि के बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती। यह माना जाता है कि इन का जन्म केरल प्रदेश के तिरुनेलवेली ज़िले के तिरुक्कुरुहुर नामक स्थान पर हुआ था। कहते हैं कि कलयुग के 43 वे वर्ष पुर्णिमा तिथि शुक्रवार का दिन था। इन के पूर्वज सभी भगवान विष्णु के उपासक थे।

इन के पिता का नाम करीमारण और माता का नाम उदेय्या था। इस दंपति के पास काफी समय तक कोई बच्चा नहीं हुआ। इस के लिए इन्होने काफी पूजा पाठ, व्रत उपवास आदि भी किए।

एक बार जब ये दोनों पति पत्नी तिरुवंपरिसरण से लौट रहे थे । रास्ते में तिरुक्कुरुंगुड़ी गाँव के वैष्णव मंदिर में कुछ समय के लिए रुके ।मंदिर में दंपति ने पूजा पाठ किया और ईश्वर से संतान प्राप्ति के लिए विशेष प्रार्थना की। ईश्वर ने इन की प्रार्थना सुन ली और समय पर इन के घर में एक बालक ने जन्म लिया। बच्चे का नाम रखा गया मारन अथवा नम्मालवार।

यह बालक भी विचित्र था–जन्म के समय न तो यह रोया, न ही इस ने माँ का दुग्ध पान किया और न ही इस ने आँखें खोली। ऐसी धारणा है कि इस के जन्म के समय स्वयं भगवान विष्णु और श्री लक्ष्मी जी वैंकुंठ धाम से नवजात शिशु को आशीर्वाद देने आए थे। जन्म के बारहवें दिन माता पिता बच्चे को भगवत दर्शन कराने के लिए नदी किनारे के मंदिर में लेकर गए।

उन्होने पास के इमली के वृक्ष पर एक पालना बना कर बच्चे को उस में लिटा दिया। कहते हैं कि बालक अपने प्रारम्भिक जीवन के 16 वर्षों तक बिना अन्न जल ग्रहण किए उसी इमली के वृक्ष के नीचे बैठे रहे।

अपने जीवन के सोलह वर्षों तक, आँखें बंद किए, अन्न का एक दाना अथवा जल की एक बूंद ग्रहण किए बिना, तिरुक्कुरुहूर गाँव के भगवान आदिनाथ मंदिर के समीप, इमली के वृक्ष के नीचे बैठे रहना एक करिश्मा ही था।

लोगों ने इमली के पेड़ को शेषनाग का अवतार माना और मारन को भगवान विष्णु का। कहते हैं जब मधुर कवि इन के पास पहुंचे तभी इन्होने आँखें खोली और मधुर कवि के प्रश्नों के उत्तर दिये । ये मधुर कवि बाद में इन के भक्त और शिष्य बन गए।

इन के बारे में एक किंवदंती यह भी है कि जन्म के समय इस बालक कि विचित्र कार्य कलापों को देख कर इन के माता पिता ने इन्हें मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने छोड़ दिया । नन्हा बालक, कहते हैं, स्वयं चलकर इमली के वृक्ष के पास गया। वृक्ष के तने में एक बड़ा कोटर था। नन्हा बालक उस में घुस कर पद्मासन लगाकर बैठ गया, आँखें बंद की और समाधि में चला गया।

मधुर कवि से जुड़ी अनेक कथाएँ हैं। एक कथा है कि मधुर कवि चोला प्रदेश के तिरुक्कुरुहुर गाँव के ब्राह्मण परिवार से थे। इन्हें वेदों,शास्त्रों और पुराणों का अच्छा ज्ञान था। एक बार ये उत्तर भारत के तीर्थाटन पर निकले। एक रात्रि में इन्हें सूदूर दक्षिण की ओर से एक बहुत ही विचित्र और अत्यधिक प्रभासित प्रकाश दिखाई दिया। प्रकाश की तीव्रता उगते हुए सूर्य की आभा से भी अधिक थी।

यह प्रकाश मधुर कवि को निरंतर तीन चार रात्रि में दिखाई देता रहा। अंततः इन्हें लगा कि दूर दक्षिण में कहीं कुछ अनहोनी घटना घटी है। मधुर कवि इस प्रकाश कि दिशा में चल पड़े। काफी दिनों की यात्रा के बाद ये तांबपर्णी नदी किनारे स्थित तिरुक्कुरुहुर गाँव तक पहुँच गए। वहाँ पहुँचते ही अचानक वह प्रकाश गायब हो गया।

मधुर कवि परेशान हो गए – आखिर वह प्रकाश कहाँ गया । इन्होंने गाँव वालों से पूछा कि उन के गाँव में कोई अनहोनी घटना हुयी है। गाँववासियों ने बताया कि “हमारे गाँव में एक विचित्र बालक है जो सोलह वर्षों से आँखें बंद किए, बिना अन्न जल ग्रहण किए इमली के वृक्ष के नीचे समाधि में लीन है। इस से अधिक विचित्र बात और क्या हो सकती है।“ मधुर कवि ने नदी किनारे जाकर मारन को देखा। उन्हें आश्चर्य हुआ और संशय भी कि इस बालक में चेतना भी है या नहीं। उन्होने एक बड़ा पत्थर उठाया और उसे मारन के पास पड़े एक दूसरे पत्थर पर फेंक कर मारा। मारन ने अचानक अपनी आँखें खोली और मधुर कवि को देखा ।

मधुर कवि ने मारन से दर्शन संबंधी अनेक प्रश्न पूछे। एक प्रश्न था–‘यदि मृत शरीर से किसी जीव का जन्म हो तो वह क्या खाएगा और कहाँ सोयेगा?’ – अर्थात “यदि किसी अचेतन पदार्थ अथवा जीव से किसी जीव अ थवा आत्मा की उत्पत्ति हो तो वह जीवित कैसे रहेगी ? उसे कौन खिलाएगा और वह कहाँ विश्राम कर सकेगी?”

मारन ने उत्तर दिया, “जन्मदायिनी वस्तु ही उस का प्रबंध करेगी अर्थात सूक्ष्म आत्मा प्रकृति के वशीभूत होकर रहेगी। प्रकृति ही उस कि क्षुधा शांत करेगी। प्रकृति का जीव के साथ यही सर्वाधिक तादात्मय होगा। जीव की अनुभूति उसी के अनुसार आनंद अथवा कष्ट दायक होगी अथवा इस प्रकार उस का ईश्वर के साथ एकाकार हो जाएगा।“

मधुर कवि इस उत्तर से हतप्रभ थे । उन्होने उसी समय मारन को अपना गुरु मान लिया और गुरु चरणों में रहने का निश्चय कर लिया। गुरु के मुखारविंद से निकले ईश भजन उनके लिए अमृत वर्षा के समान थे । मधुर कवि ने इन भजनों को लिपिबद्ध करना शुरू कर दिया। तिरुविरुत्तम, तिरुवाशिरियम, पेरिम तिरुवनतादि और

तिरुवायमोली ऐसी ही रचनाएँ हैं। इन सब का प्रकाशन मारन कि मृत्यु के बाद ही हुआ। मधुर कवि के शिष्यत्व ग्रहण करने के बाद ही मारन का नाम नम्मलवार हुआ। तिरुविरुत्तम, तिरुवाशिरियम, पेरिम तिरुवनतादि और तिरुवायमोली चारों ही अत्यंत प्रसिद्ध रचनाएँ हैं :– इन चारों में तिरु शब्द का प्रयोग किया गया है–तिरु का अर्थ है :– शुभ, दैवीय अथवा कल्याणकारी।

सत्यान्वेषी, जन्मजात सिद्धि प्राप्त जीवात्मा, प्रभु के अंशावतार नम्मालवार मात्र 35 वर्ष की आयु में ही महाप्रयाण कर गए। वे एक उत्कृष्ट भक्त कवि थे। उन का सम्पूर्ण जीवन ‘ध्यान’ और ‘प्रकट’ में समाहित था। उन के मुखार विंद से प्रभु भजन के पद स्वयमेव ही प्रकट होते थे। उन के भजनों का गायन सभी वैष्णव मंदिरों में होता है। आलवार तिरुनगरी के वर्तमान मंदिर में नम्मालवार की मूर्ति स्थापित है और वह अन्य देवों की भांति ही पूजनीय है।

SANT SWAMI RAGHVENDR TEERTH संत स्वामी राघवेन्द्र तीर्थ

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SANT SWAMI RAGHVENDR TEERTH संत स्वामी राघवेन्द्र तीर्थ

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एक बार दक्षिण भारत के तंजावुर राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। यहाँ तक की प्रजा के भूखों मरने की नौबत तक आ गयी। राजा ने प्रजा के कल्याण के लिए जितने भी संभव उपाय थे वे सभी कर लिए परन्तु सब व्यर्थ। अंत में जब राजा अत्यंत दुःखी थे तो उन्हें किसी ने राघवेन्द्र स्वामी के बारे में बताया। अंतिम उपाय मान कर राजा राघवेन्द्र स्वामी के पास गए और स्वामी जी को लेकर अपने राज्य में आये और अपना अन्न भंडार दिखाया। स्वामी जी ने भंडार का दरवाज़ा खोले बगैर ही अपने हाथ से द्वार पर संस्कृत में ‘श्री’ नाम का बीजाक्षर लिख दिया और वहां बैठ कर जप किया। यह कार्यक्रम दस दिन तक चला। स्वामी जी प्रतिदिन नए ढंग से श्री लिखते और वहीं बैठ कर जप करते। दस दिन के पश्चात राज्य में भारी वर्षा हुयी और अन्न के भण्डार भर गए।

राजा स्वामी जी के ह्रदय से आभारी थे। उन्होंने अपना स्वर्ण जटित हार स्वामी जी को भेंट स्वरूप दिया। स्वामी जी ने उस हार को यज्ञ की अग्नि को समर्पित कर दिया। राजा को यह अच्छा नहीं लगा। उसे लगा की स्वामी जी ने उस के उपहार का अपमान कर दिया है।

स्वामी जी राजा की ओर देखा, यज्ञ के अग्नि कुण्ड में हाथ डाल कर हार निकाला और राजा को वापिस कर दिया। राजा समझ गया कि “जिस व्यक्ति ने संसार की मोह माया को त्याग दिया है उस के लिए एक हार क्या महत्व रखता है।”

एक बार स्वामी राघवेन्द्र बीजापुर गए। भीषण गर्मी का समय था। स्वामी जी ने देखा कि गर्मी के कारण रास्ते में एक निर्धन व्यक्ति गिरा पड़ा है। वह उठने में असमर्थ है। स्वामी जी ने मंत्र पढ़ा और कहते हैं उस रेतीले रास्ते में पानी धार निकल आयी।

उस निर्धन व्यक्ति के प्राण बच गए। इसी प्रकार एक बार स्वामी जी तपती दुपहरी में एक दल के साथ यात्रा कर रहे थे। उस दल में एक छोटा बच्चा भी था। असहनीय गर्मी के कारण बच्चा परेशान हो गया और रोने लगा। स्वामी जी बच्चे की तरफ अपना अँगोछा फेंका। अचानक अँगोछा बच्चे के ऊपर एक छाया के समान तन गया।

इस तरह की अनेक चमत्कारिक घटनाएं उन के जीवन से जुडी हैं। कहते हैं एक बार इन्होंने अग्नि सूक्त के मंत्रोच्चारण से गीले चन्दन में अग्नि प्रज्वलित कर दी थी। इस के बाद उसी चन्दन को वरुण सूक्त के मंत्रोच्चारण से ठंडा भी कर दिया। स्वामी जी कहा ‘मुझे भगवत आदेश हुआ था। ‘

इन सब घटनाओं के बारे में स्वामी जी का कहना था कि “मैं कोई जादू टोना या तंत्र मंत्र नहीं जानता। न ही इस में कोई योग विद्या है। यह भगवान की कृपा है। मेरा उद्देश्य भगवान के भक्तों के कष्टों का निवारण करना है। इस तरह मैं भगवान और भक्तों के बीच सीधा संपर्क स्थापित करता हूँ। स्वामी जी का मूल उद्देश्य था दुःखी और पीड़ित व्यक्ति की सहायता करना। दया, सहानुभूति और करुणा इन के मूल भाव थे। ये द्वैत दर्शन और वैष्णव वाद के समर्थक थे।

स्वामी जी का जन्म सं 1595 में तमिलनाडु के भुवन गिरी (कावेरीपट्नम) नामक स्थान पर हुआ था। इन की माता का नाम गोपाम्बा और पिता का नाम तिमन्ना भट्ट था। इन का बचपन का नाम वेंकट भट्ट था।

ये अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे और इन्हें वेदांत पढ़ने की उत्कट इच्छा थी। सात वर्ष की आयु में उपनयन संस्कार होने के बाद ही ये गुरु की तलाश में निकल पड़े। इन्होंने कुम्भकोणम के प्रसिद्ध संत सुधीन्द्र तीर्थ की ख्याति सुनी थी। ये उन के पास पहुँच गए। उन्हें अपना गुरु मान कर उन के चरणों में अपना शीश रख दिया।

एक प्रकार से इन्होंने स्वयं को गुरु को समर्पित कर दिया। गुरु भी ऐसे जिज्ञासु शिष्य को देख कर प्रसन्न हो गए। गुरु से इन्होंने द्वैत सिद्धांत और व्याकरण की शिक्षा ली। इन की लगन को देखकर ओर गुरु की विशेष कृपा के कारण अन्य शिष्य इन से ईर्ष्या करने लगे। एक दिन शिष्यों ने मिलकर गुरु जी से इन की शिकायत की ‘गुरु जी , वेंकट स्वयं भी कुछ नहीं पढ़ता और हमें भी पढ़ने नहीं देता। ‘

एक दिन अचानक रात्रि में गुरु जी शिष्यों की शिकायत की जांच करने शिष्यों की कुटी में पहुँच गए। गुरु जी ने देखा कि सभी शिष्य गहरी निद्रा में लीन हैं, सभी ने अच्छा गद्दा और अच्छा तकिया आदि लगा रखा है लेकिन कहीं भी न तो कोई दिया है और न कोई प्रकाश, न कोई पुस्तक, न कहीं कोई पढ़ाई का चिन्ह। लेकिन इन में वेंकट नहीं था। गुरु जी चिंतित हो गए- कहाँ गया वेंकट ?

इधर उधर खोजा तो देखा कि वह कुटी के एक कोने में अपने हाथ का तकिया बना कर जमीन पर सो रहा था, उस के पास गद्दा भी नहीं था। ठंडी हवा चल रही थी लेकिन वेंकट के पास चादर भी नहीं थी।

पास में सूखी पत्तियों का ढेर था जो शायद प्रकाश करने के लिए जमा की थी। पास में ही एक पुस्तक ‘न्याय सुधा’ रखी थी और हाथ के लिखे कुछ भोज पत्र। गुरु जी का मन दया से भर गया। उन्होंने अपनी चादर वेंकट को ओढ़ा दी। वे लिखी हुई भोज पत्र की पत्तियाँ उठा कर ले आये।

अपनी कुटी में आकर गुरु जी ने उन पत्तियों को पढ़ा और देखा बालक वेंकट ने ‘न्याय सुधा’ पुस्तक की टीका लिखी हुई थी। गुरु जी की आँखों में प्रसन्नता के आंसू आ गए।

गुरु सुधीन्द्र तीर्थ अब बूढ़े हो चले थे। उन्हें अपने मठ के लिए एक अच्छे शिष्य की आवश्यकता थी और वेंकट भट्ट जैसा शिष्य उन के अनुकूल था। लेकिन वेंकट निर्धन होने के कारण कुछ संकोची था। वह अपना गुजारा ही मुश्किल से कर पाता था ।

निर्धन होने के बाद भी वह संगीत और संस्कृत का अध्यापन निशुल्क करता था। गुरु जी को अचानक स्वप्न में आदेश हुआ कि वेंकट भट्ट ही मठाधीश होने के योग्य है। दूसरे दिन प्रातः काल में ही गुरु जी ने अपने स्वप्न की बात वेंकट से की। वेंकट ने गुरु जी से अपनी असमर्थता जताई ,”गुरु जी मैं गृहस्थ हूँ, मेरी पत्नी और एक बच्चा है। ”

उसी रात्रि में वेंकट भट्ट को स्वप्न में देवी सरस्वती के दर्शन हुए। वेंकट भट्ट को देवी का आदेश हुआ कि वे स्वयं को हरी और वायु को सौंप दें। वेंकट के मन की उलझन दूर हो गयी। यह उनके लिए प्रभु का आदेश था। वे पीठाधिपति बनने के लिए तैयार हो गए। अब वे स्वामी राघवेन्द्र तीर्थ कहलाये। इस के बाद वे तीर्थाटन पर निकल गए। इन्होंने तिरुपति, श्रीशैलम, कुंभकोणम, कांची, मदुरै, श्रीरंगम, विष्णु मंगल, सुब्रामण्य, उडुपी आदि स्थानों की यात्रा की। इन सभी स्थानों पर उपनिषदों पर विशेषकर ईशोपनिषद पर प्रवचन दिए, शास्त्रार्थ किये, तंत्र दीपिका की रचना की और अनेक ग्रंथों की टीकाओं पर टिप्पणियाँ लिखी।

मणिश्रृंगा में प्रमाण पद्धति पर व्याख्यान देते समय इन्हें लगा कि इन ग्रंथों की विवेचना यदि सरल भाषा में की जा सके तो जन साधारण को इस से लाभ होगा। अतः यहाँ रह कर प्रमाण पद्धति, वडावली, प्रमाण लक्षण तथा अन्य ग्रंथों की टीका लिखी।

रामेश्वरम और मदुरै की यात्रा के समय स्वामी जी की भेंट उस समय के मूर्धन्य विद्वान नीलकंठ दीक्षित से हुई, उन से शास्त्रार्थ किया और उन्हें अपना ग्रन्थ ‘भट्ट संग्रह’ दिखाया।

नीलकंठ दीक्षित ने इन्हें ‘पूर्ण प्रज्ञ’ की उपाधि से अलंकृत किया और हाथी पर बिठा कर पूरे नगरवासियों को इन के दर्शन कराये। श्रीरंगम में स्वामी जी ने अपने शिष्यों के अनुरोध पर उपनिषदों की व्याख्या पर आधारित प्रवचनों को संकलित किया।

स्वामी जी ने विष्णु मंगल सुब्रमण्य और उडीपी की यात्रा की। बिदारहली में इन की भेंट प्रसिद्ध संत श्रीनिवासाचार्य से हुई। वे स्वयं विद्वान होते हुए भी उन्होंने स्वामी जी का शिष्यत्व ग्रहण किया। स्वामी जी ने उन का नाम श्रीनिवासाचार्य से बदल कर श्रीनिवास तीर्थ कर दिया। बिदारहाली के बाद पंढरपुर, कोल्हापुर, बीजापुर में तत्ववाद दर्शन पर प्रवचन दिए।

मालखंड, श्री जय तीर्थ का वृन्दावन, कागिनी नदी के तट पर स्थित एक स्थान है। यहाँ रहकर स्वामी जी ने अपने प्रवचनों और सिद्धांतों का शुद्ध मंगला समारोह आयोजित किया।

“जिस प्रकार कागिनी, कृष्णा, और भीमा नदियों का संगम होता है और ये तीनों मिलकर सागर में जाती हैं। उसी प्रकार जय तीर्थ ने श्री माधवाचार्य के अद्वितीय गुणागार भगवान श्री कृष्ण सम्बन्धी सिद्धांतों की विवेचना की है।

अपनी यात्राओं से स्वामी राघवेन्द्र ने भौगोलिक दृष्टि से लम्बी लम्बी दूरियां तय की वह भी ऐसे समय जब यातायात और संचार साधनों का सर्वथा अभाव था। इन के प्रवचनों में विशेष बल द्वैतवाद पर था। इन के उपदेशों में भक्ति और ज्ञान का समन्वय है। लगभग 50 वर्षों तक ये पीठाधिपति रहे। इनकी विद्वता तर्कशास्त्र, मीमांसा, धर्मशास्त्र, 64 कलाएं, संगीत, और योगशास्त्र में अद्वितीय थी।

आंध्र प्रदेश के अडोनी स्थान के नवाब थे सिद्धि मसूद खान। स्वामी जी की विद्वता से प्रभावित होकर नवाब ने अपनी रियासत का तुंग भद्रा नदी के किनारे का मांचला नामक स्थान इन को भेंट में दे दिया।

इस स्थान पर स्वामी जी ने आश्रम की स्थापना की जिस का नाम दिया ‘वृन्दावन मंत्रालय ‘ , कहते हैं भक्त प्रह्लाद ने इसी स्थान पर यज्ञ किया था। इस स्थान के पत्थर और शिलाखंड अत्यंत पवित्र और पूजनीय माने जाते हैं। कहा जाता है की त्रेता युग में भगवान राम और सीता का स्पर्श इन्हें प्राप्त हुआ था। भगवान श्री राम ने अपनी यात्रा के दौरान इन्हीं शिलाखंडों पर विश्राम किया था। 300 वर्ष पूर्व अर्थात सन 1671 में स्वामी जी ने इसी स्थान पर समाधि ली थी।

श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया के दिन स्वामी जी वृन्दावन के मंत्रालय में समाधि की मुद्रा में बैठ गए। वे अपनी माला से जाप करते जा रहे थे। जब उन्होंने जाप समाप्त किया, उन के शिष्य ने 1200 वां शालिग्राम कांस्य के पात्र में रखा। वह पात्र उस ने स्वामी जी के शीर्ष पर रखकर उन के शरीर पर एक आवरण ढक दिया।

यह दिन स्वामी जी के महा निर्वाण का दिन माना जाता है। विश्वास किया जाता है कि स्वामी जी ने परोक्ष रूप से संकेत दिया था कि वे आगामी 700 वर्षों तक अपने शिष्यों और भक्तों के मध्य उपस्थित रहेंगे। यह उपस्थिति सशरीर न होते हुए भी सशरीर होने का आभास देती रहेगी।

दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश के कर्नूल ज़िले के तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित पवित्र मंदिर है। दूर दूर के स्थानों से यात्री इस स्थान के दर्शन करने और पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं।

MADHVACHARY DWAET SAMPRADAY-DUALISM OF GOD माधवाचार्य (द्वैत सम्प्रदाय)

A faith healer, psychoanalyst, and marriage-love counsellor.

MADHVACHARY DWAET SAMPRADAY-DUALISM OF GOD माधवाचार्य (द्वैत सम्प्रदाय)

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj 

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भगवान भक्ति को ही मोक्ष का सर्वोपरि साधन मानने वाले रामानुज-सम्प्रदाय के पश्चात एक तीसरा सम्प्रदाय निकला जिसे द्वैत सम्प्रदाय कहते हैं। इस के प्रवर्तक थे संत माधवाचार्य। संत राम सखे इन के अनुयायी थे। माधवाचार्य एक महान संत और समाज सुधारक थे। इन्होंने ब्रह्म सूत्र और दस उपनिषदों की व्याख्या लिखी।

इन का जन्म दक्षिण भारत के दक्षिण केनारा ज़िले के ग्राम बेलाली में सन 1199 में विजय दशमी के दिन हुआ था। यह गाँव प्रसिद्ध शहर उडीपी के पास है। इन के पिता का नाम मध्यगेह भट्ट और माता का नाम वेदवती था। इन का बचपन का नाम वासुदेव था और सन्यासी बनने पर ये मध्यस्वामी आनंदतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

माधव शारीरिक व्यायाम और कसरत के शौकीन थे। दौड़ लगाना, कूदना, फांदना, तैराकी और कुश्ती इन के प्रिय खेल थे। इस लिए सब लोग इन्हें भीम के नाम से पुकारते थे। इस के साथ ही इन का रुझान वेद और वेदांग के अध्ययन में भी था। सात वर्ष की आयु में उपनयन संस्कार के बाद इन्होंने तोताचार्य से वेदों और शास्त्रों की शिक्षा ली। स्वयं को ये माधव कहलाना पसंद करते थे। 25 वर्ष की आयु में इन्होंने सन्यास की दीक्षा ली। तब इन के गुरु थे अच्युत प्रकाश आचार्य। गुरु जी इन्हें नया नाम दिया ‘पूर्ण प्रज्ञ’ क्योंकि गुरु जी ने इन्हें वेदान्त और अन्य शास्त्रों में ज्ञानवान और तीव्र बुद्धि का पाया।

कुछ समय के बाद ही गुरु जी ने इन्हें मठ का अध्यक्ष बना दिया। अब इन का नाम आनंद तीर्थ हो गया। इस समय में इन्होंने उत्तर और दक्षिण भारत का विस्तृत भ्रमण किया।

उत्तर भारत के भ्रमण के दौरान ये 48 दिन तक बदरी नाथ रहे और यहाँ के अपने पूरे प्रवास में इन्होंने पूजा अर्चना, ध्यान और उपवास किया। इस यात्रा के बाद इन्होंने वेदान्त सूत्र और गीता की टीका लिखी। अपनी अन्तःप्रेरणा से ये बदरी नाथ से भी ऊपर व्यास आश्रम गए। इन्होंने अनेक मंदिरों का निर्माण भी कराया।

जिस में उडीपी को मुख्य केंद्र बनाया। माधव सम्प्रदाय के हर संत की अपने जीवन में एक बार उडीपी जाने की इच्छा अवश्य होती है ।माधव अपने अधिक समय शिष्यों की शिक्षा में लगाते थे। जैन, बौद्ध और अद्वैत सम्प्रदाय के बारे में पढ्ना, समझना और तर्क करना इन्हें अधिक अच्छा लगता था।

कहते हैं माधव के पास कुछ अलौकिक शक्ति थी। अपने जीवन इन्होंने अनेक आश्चर्य जनक कार्य किए। एक बार समुद्री तूफान में एक नाव फंस गई। इस नाव को माधव ने अपनी शक्ति से बचाया था।

एक बार एक नाव में आग लग गई। इस नाव में भगवान कृष्ण की एक मूर्ति भी थी। माधव ने तैर कर नाव से मूर्ति को बचा लिया। इन के भ्रमण के दौरान एक बार राजा ईश्वर देव ने माधव से समुद्री नदी पर बन रहे बाँध के काम को देखने के लिए कहा। माधव ने शाम को अनुभव किया कि वे अचेतन रूप से दिन भर राजा के लिए कार्य करते रहे। काम के दौरान जब माधव बीच में स्नान ध्यान के लिए गए तो कहते हैं समुद्र की लहरें शांत हो गई और उस दौरान काम रुक गया। अपनी भारत यात्रा के दूसरे चरण में कहते हैं कि ये समुद्र पर इस तरह चले जैसे कि पृथ्वी पर पैदल चल रहे हों। समुद्री लहरें इन के देखने मात्र से शांत हो जाती थी।

माधवाचार्य की राम में अटूट भक्ति थी। वे उत्तरी भारत की यात्रा के समय बदरी आश्रम से ‘दिग्विजयी राम’ की मूर्ति दक्षिण ले गए थे। उन्होंने अपने शिष्य नर–हरितीर्थ से 1264 ई के लगभग जगन्नाथ पुरी से मूल राम और सीता की मूर्ति मँगवाई थी। यही मूर्ति मैसूर में ‘मूलराम’ के नाम से स्थापित की गई थी। माधवाचार्य को हनुमान जी का अवतार माना जाता है।

इन्होंने अपनी पुस्तक ‘मध्य विजय’ में राम दूत हनुमान का यशोगान किया है। ‘द्वादश स्तोत्र’ में जानकी-कन्त-राघव की वंदना पूरी निष्ठा से की गई है। इस के अतिरिक्त माधव मत में भीम की भी अत्यधिक मान्यता है। माधवाचार्य को द्वैत सम्प्रदाय के प्रवर्तक माना जाता है।

इन के वैष्णव वाद को सत वैष्णव वाद कहा जाता है जो रामानुज के वैष्णव वाद से बिलकुल अलग है। इन के अनुसार विष्णु अथवा नारायण ही सर्वोच्च है।

माधव मत में ‘पंच भेद’ में पूरी आस्था रखने पर बल दिया गया। पंच भेद का अर्थ है :– पाँच बातों में अंतर की जानकारी। (1). सर्वोच्च सत्ता यानि परमेश्वर और जीवात्मा में अंतर। (2). एक जीवात्मा दूसरी से भिन्न है। (3). भगवान जड़, प्रकृति और चेतन जीव से सर्वथा भिन्न हैं। (4). ब्रह्म ही सर्वोच्च है, वास्तविक है, वह जीव और प्रकृति से भिन्न है। जगत सत्य है, उस के कर्ता भगवान हैं। अतः जगत के मिथ्या होने का प्रश्न ही नहीं है। (5). अपने वास्तविक स्वरूप की अनुभूति ही मुक्ति है। ब्रह्म ही सर्वोच्च है, एक वास्तविकता है। वह जीव और प्रकृति से भिन्न है। समस्त जीव ईश्वर के अनुचर हैं। क्योंकि जीव ईश्वर के आधीन रह कर ही अपना काम चला सकता है। जीव में स्वतंत्र होकर काम करने की अपनी क्षमता नहीं है।

सामान्यतः विष्णु की भक्ति के तीन तरीके बताए गए हैं :–

(1). अंकन :– शरीर पर ईश्वर के प्रतीक बनाना।

(2). नामकरण :– अपने बच्चों के नाम भगवान के नाम पर रखना।

(3). भजन :- अर्थात भगवान स्तुति गायन, उस की आराधना करना तथा पूजा अर्चना करना। माधवाचार्य ने इस में एक और साधन जोड़ा :- (4). स्मरण करना।

इन्होंने इसी पर अधिक ज़ोर दिया। इन का कहना था – ‘भगवान के नाम का स्मरण करने का अभ्यास करें। इस से नाम को याद रखना सहज हो जाएगा और अंत में मृत्यु के समय भगवत नाम स्वतः ही याद रहेगा।‘

मोक्ष प्राप्ति के लिए माधवाचार्य ने तीन साधन बताए :– ‘त्याग, भक्ति, और प्रत्यक्ष अनुभव। ईश्वर को जानने के लिए व्यक्ति को वेदों का अध्ययन, अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण तथा पूर्ण समर्पण के लिए तैयार रहना चाहिए। ‘माधवाचार्य के ये ही उपदेश थे।

माधवाचार्य ने जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति की अवधारणा को स्वीकार किया। ‘जब जीव धर्म का अनुसरण करता है, परमेश्वर के प्रति श्रद्धावान रहता है, दास भाव से भक्ति करता है, परमात्मा की शरण में आनंद अनुभव करता है, तभी उसे परमात्मा से अपरोक्ष ज्ञान का प्रसाद मिलता है। अपरोक्ष ज्ञान अर्थात प्रत्यक्ष अनुभव। इस के लिए वह श्रवण, मनन और ध्यान की प्रक्रिया से गुज़रता है।‘

इस पूरी प्रक्रिया के लिए दो आवश्यकता हैं (1). पूर्ण वैराग्य अर्थात भौतिक सांसारिक प्रपंचों से मुक्ति और (2). कर्म योग – जैसा कि श्री मदभगवतगीता में प्रतिपादित है। वैराग्य और कर्म योग से ज्ञान प्राप्ति में सहायता मिलती है और इसी पर भक्ति आधारित है। मुक्ति प्राप्त होने पर जीव बैकुंठ को प्राप्त करता है जहाँ वह पूर्ण परब्रहम की सेवा में अहर्निश रहता है। यही मोक्ष अथवा वास्तविक मुक्ति है ।

माधवाचार्य ने संस्कृत में विपुल वैष्णव साहित्य की रचना की। महत्वपूर्ण उपनिषदों की व्याख्या के अतिरिक्त उन्होने गीता भाष्य, गीता-तात्पर्य-निर्णय, बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव, ब्रह्मसूत्र भाष्य, महाभारत-तात्पर्य निर्णय, महाभारत, भगवत-तात्पर्य-निर्णय, वेद भाष्य आदि अनेक ग्रंथ लिखे। ‘विष्णु-तत्व-विनिर्णय में विष्णु भगवान की सर्वोच्चता बताई है। कृष्णामत – महार्णव में विष्णु स्तुति में 242 पद हैं। इन की अन्य रचनाएँ हैं – अनुभाष्य, अनुव्याख्यान, तत्व-सांख्य, तत्व-घोष, सदाचार-स्मृति आदि।

भारतीय अध्यात्म में विष्णु का एक अलग स्थान है । विष्णु सहस्रनाम के प्रारम्भिक श्लोक में इन्हें सच्चिदानंद स्वरूप, सब कर्म करने वाले, वेदांतवेध, बुद्धिसाक्षी, श्री गुरुवार श्री कृष्णचंद्र कहा गया है । वेद और वेदान्त के संपर्क सूत्र के रूप में भी भगवान विष्णु की मान्यता है । हरिवंश पुराण में कहा गया है :–

वेदे, रामायणे, चैत्व पुराणे, भारते तथा; अद्वन्ते च मध्ये च विष्णे हे सर्वत्व गीयते।

वेद रामायण पुराण और महाभारत में, आदि, मध्य और अंत में :– सभी जगह विष्णु की प्रशस्ति कई गई है।

माधवाचार्य ने अपने शिष्यों को अपने अंतिम उपदेश में एतरेय उपनिषद से उद्धरण दिया :– ‘प्रमाद मत करो, गतिशील रहो, इच्छुक लोगों को सदवचन कहो, और वास्तविक ज्ञान का प्रसार करो ।‘ माधवाचार्य ने संस्कृत में भजनों की रचना की। इन में देवदास स्तोत्र, यमक भारत, नरसिंह नखस्तोत्र प्रमुख हैं। अन्य रचनाएँ थी :– शुद्ध न्यायदीपिका, प्रमेयदीपिका और तत्व प्रकाशिका। जय तीर्थ और व्यास तीर्थ इन के दो प्रमुख शिष्य थे। इन के अन्य शिष्य थे – नरहरीनाथ, पद्मनाभतीर्थ, और माधवतीर्थ सन्त माधवाचार्य (द्वैत सम्प्रदाय) :: भगवान भक्ति को ही मोक्ष का सर्वोपरि साधन मानने वाले रामानुज-सम्प्रदाय के पश्चात एक तीसरा सम्प्रदाय निकला जिसे द्वैत सम्प्रदाय कहते हैं। इस के प्रवर्तक थे संत माधवाचार्य। संत राम सखे इन के अनुयायी थे।