MAHA BHART (3) WAR महाभारत युद्ध

A faith healer, psychoanalyst, and marriage-love counsellor.

MAHA BHART (3) WAR महाभारत युद्ध

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 

By :: Pt. Santosh  Bhardwaj  

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ॐ गंगणपतये नमः 

ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवाव शिष्यते॥ 

गजानन भूतगणादिसेवितं कपिथ्यजम्बूफलचारुभक्षणम्।

उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपपंकजम्॥ 

सत्य और न्याय  रक्षा के लिए लड़ा गया महाभारत एक धर्मयुद्ध था। इससे जुड़े अवशेष दिल्ली के आस-पास और हस्तिनापुर में भी मौजूद हैं। इस काल से सम्बन्धी वस्तुएँ यूरोप से लेकर द्वारका तक उपलब्ध हैं। दिल्ली के पुराने किले को पाण्डवों का किला कहा जाता है, यद्यपि इस क्षेत्र में अन्य बेहतर किलों के अवशेष अभी भी स्थित हैं, जो कि कश्मीरी गेट से लेकर पुराने किले तक बिखरे पड़े हैं। कुरुक्षेत्र में महाभारत काल के बाण और भाले प्राप्त हुए हैं। गुजरात के पश्चिमी तट पर समुद्र में डूबे 5,000 वर्ष पुराना द्वारका और बरनावा में लाक्षागृह के अवशेष हैं।

महाभारत युद्ध होने का मुख्य कारण कौरवों की महत्वाकांक्षा और धृतराष्ट्र का पुत्र मोह और दुर्योधन के मन में पाण्डवों अत्यधिक ईर्ष्या और घृणा का भाव था। कौरव और पाण्डव सहोदर थे। भगवान् वेदव्यास जी से नियोग के द्वारा विचित्रवीर्य की भार्या अम्बिका के गर्भ से धृतराष्ट्र और अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु उत्पन्न हुए। धृतराष्ट्र ने गान्धारी के गर्भ से सौ पुत्रों को जन्म दिया, उनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था। पाण्डु के युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव आदि पाँच पुत्र हुए। धृतराष्ट्र जन्म से ही नेत्रहीन था, अतः उनकी जगह पर पाण्डु को विदुर नीति के तहत राज्य प्राप्त हुआ, जिससे अक्षम धृतराष्ट्र को सदा पाण्डु और उसके पुत्रों से द्वेष रहने लगा। यह द्वेष दुर्योधन के रूप मे फलीभूत हुआ और शकुनि ने इस आग में घी का काम किया। शकुनि के कहने पर दुर्योधन ने बचपन से लेकर लाक्षागृह तक कई षडयंत्र किये; परन्तु हर बार विफल रहा। युवावस्था आने पर जब युधिष्ठिर को युवराज बना दिया गया तो उसने उन्हें लाक्षागृह भिजवाकर मारने की कोशिश की; परन्तु पाण्डव बच निकले। पाण्डवों की अनुपस्थिति में धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को युवराज बना दिया, परन्तु जब पाण्डवों ने वापिस आकर अपना राज्य वापिस माँगा, तो उन्हें राज्य के नाम पर खाण्डव प्रस्थ दे दिया गया। गृहयुद्ध के संकट से बचने के लिए युधिष्ठिर ने यह प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया। भगवान् श्रीकृष्ण के आदेश विश्वकर्मा ने इंद्रप्रस्थ का निर्माण इन्द्र देव के स्वर्ग में स्थित अमरावती पुरी के समान किया। पाण्डवों ने विश्वविजय करके प्रचुर मात्रा में रत्न एवं धन एकत्रित किया और राजसूय यज्ञ किया। दुर्योधन पाण्डवों की उन्नति देख नहीं पाया और शकुनि के सहयोग से द्यूत में छ्ल से युधिष्ठिर से उसका सारा राज्य जीत लिया और कुरु राज्य सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास कर उसे अपमानित किया। इसी दिन महाभारत के युद्ध के बीज पड़ गये थे। अन्ततः पुनः द्यूत में हारकर पाण्डवों को 12 वर्षो को वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास स्वीकार करना पड़ा। परन्तु जब यह शर्त पूरी करने पर भी कौरवों ने पाण्डवों को उनका राज्य देने से मना कर दिया। तो पाण्डवों को युद्ध करने के लिये मज़बूर होना पड़ा। भगवान् श्री कृष्ण के युद्ध रोकने के हर प्रयास को दुर्योधन द्वारा ठुकरा दिया गया।

भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवों की तरफ से कुरुराज्य सभा में शांति दूत बनकर गये और वहाँ भगवान् श्री कृष्ण ने दुर्योधन से पाण्डवों को केवल पाँच गाँव देकर युद्ध टालने का प्रस्ताव रखा। परन्तु जब दुर्योधन ने पाण्डवों को सुई की नोंक जितनी भी भूमि देने से मना कर दिया, तो अन्ततः युधिष्ठिर को युद्ध करने के लिये तैयार होना ही पड़ा। कौरवों ने 11 अक्षौहिणी तथा पाण्डवों ने 7 अक्षौहिणी सेना एकत्रित की। युद्ध की तैयारियाँ पूर्ण करने के बाद कौरव और पाण्डव दोनों दल कुरुक्षेत्र पहुँचे, जहाँ यह भयानक और घमासान संहारक युद्ध हुआ।

महाभारत काल के क्रमशः महाशक्तिशाली जनपद और उनके प्रतिनिधि ::

कुरु-भीष्म, मगध-जरासंध, प्राग्ज्योतिषपुर-भगदत्त, शूरसेन-यादव, पांचाल-द्रुपद, बाह्लिक-भूरिश्र्वा, मद्र-शल्य, काम्बोज-सुदक्षिण, शाल्वभोज-शाल्व,मत्स्य-विराट, सौराष्ट्र-भोज,अवन्ति-विन्द एवं अनुविन्द, सिन्ध-जयद्रथ, चेदि-शिशुपाल।

ये जनपद अत्यधिक विकसित और आर्थिक रुप से सुदृढ थे। इनमें कुरु और यादव सर्वाधिक शक्तिशाली थे और केवल यही दो जनपद थे, जिन्होंने उस काल में राजसूय और अश्वमेध यज्ञ किये थे।

युद्ध की तैयारियाँ पूर्ण करके कौरव और पाण्डव दोनों दल कुरुक्षेत्र पहँचे। पाण्डवों ने कुरुक्षेत्र के पश्चिमी क्षेत्र में सरस्वती नदी के दक्षिणी तट पर बसे समन्त पंचक तीर्थ से बहुत दूर हिरण्यवती नदी (सरस्वती की ही एक सहायक धारा) के तट के पास अपना पड़ाव डाला और कौरवो ने कुरुक्षेत्र के पूर्वी भाग मे वहाँ से कुछ योजन की दूरी पर एक समतल मैदान मे अपना पड़ाव डाला। दोनों पक्षों ने वहाँ चिकने और समतल प्रदेशों मे जहाँ घास और ईंधन की अधिकता थी, अपनी सेना का पड़ाव डाला। युधिष्ठिर ने देवमंदिरों, तीर्थों और महर्षियों के आश्रमों से बहुत दूर हिरण्यवती नदी के तट के समीप हजारों सैन्य शिविर लगवाये। वहाँ प्रत्येक शिविर में प्रचुर मात्रा में खाद्य सामग्री, अस्त्र-शस्त्र, यन्त्र और चिकित्सक-वैद्य और शिल्पी उपस्थित थे। युद्ध में सामान्य नागरिकों, सेवकों को कोई हानि नहीं हुई। दुर्योधन ने भी इसी तरह हजारों पड़ाव डाले। वहाँ केवल सेनाओ के बीच में युद्ध के लिये केवल 5 योजन का घेरा छोड़ दिया गया। अगले दिन प्रातः दोनों पक्षों की सेनाएँ एक दूसरे के आमने-सामने आ डटीं।

युद्ध के नियम :: पाण्डवों ने अपनी सेना का पड़ाव समन्त्र पंचक तीर्थ पास डाला और कौरवों ने उत्तम और समतल स्थान देखकर अपना पड़ाव डाला। उस संग्राम में हाथी, घोड़े और रथों की कोई गणना नहीं थी। पितामह भीष्म की सलाह पर दोनों दलों ने एकत्र होकर युद्ध के निम्नलिखित प्राचीनतम और प्रचलित नियमों का अनुपालन करने में सहमति व्यक्त की। रात्रि में दोनों पक्ष सामान्य जनों की तरह सामान्य बातचीत करते, मिलते-जुलते थे।

(1). प्रतिदिन युद्ध सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक ही रहेगा।

(2). युद्ध समाप्ति के पश्‍चात् छल कपट छोड़कर, सभी लोग प्रेम का व्यवहार करेंगे।

(3). रथी रथी से, हाथी वाला हाथी वाले से और पैदल पैदल से ही युद्ध करेगा।

(4). एक वीर के साथ एक ही वीर युद्ध करेगा।

(5). भय से भागते हुए या शरण में आये हुए लोगों पर अस्त्र-शस्त्र का प्रहार नहीं किया जायेगा।

(6). जो वीर निहत्था हो जायेगा, उस पर कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं उठाया जायेगा।

(7). युद्ध में सेवक का काम करने वालों पर कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं उठायेगा।

इस प्रकार युद्ध संबंधी नियम स्वीकार कर दोनों दल युद्ध के लिये प्रस्तुत हुए। पाण्डवों के पास सात अक्षौहिणी सेना थी और कौरवों के साथ ग्यारह अक्षौहिणी सेना थी। दोनों पक्ष की सेनाएँ पूर्व तथा पश्‍चिम की ओर मुख करके खड़ी हो गयीं। कौरवों की तरफ से पितामह भीष्म और पाण्डवों की तरफ से अर्जुन सेना का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। कुरुक्षेत्र के केवल 5 योजन (40 किलोमीटर) के क्षेत्र के घेरे मे दोनों पक्ष की सेनाएँ खड़ी थीं।

न पुत्रः पितरं जज्ञे पिता वा पुत्रमौरसम्। भ्राता भ्रातरं तत्र स्वस्रीयं न च मातुलः॥[महाभारत भीष्म पर्व]

उस युद्ध में न पुत्र पिता को, न पिता पुत्र को, न भाई भाई को, न मामा भांजे को, न मित्र मित्र को पहचानता था। युद्ध में गांधार, मद्र, सिन्ध, काम्बोज, कलिंग, सिंहल, दरद, अभीषह, मागध, पिशाच, कोसल, प्रतीच्य, बाह्लिक, उदीच्य, अंश, पल्लव, सौराष्ट्र, अवन्ति, निषाद, शूरसेन, शिबि, वसति, पौरव तुषार, चूचुपदेश, अशवक, पाण्डय, पुलिन्द, पारद, क्षुद्रक, प्राग्ज्योतिषपुर, मेकल कुरुविन्द, त्रिपुरा, शल, अम्बष्ठ, कैतव, यवन, त्रिगर्त, सौविर, प्राच्य, पांचाल, चेदि, काशी, करुष, मत्स्य, केकय, सृंजय, दक्षार्ण, सोमक, कुन्ति, आन‍र्त, दाशेरक, प्रभद्रक,अनूपक, किरात, पटच्चर तित्तिर, चोल, पाण्ड्य, अग्निवेश्य, हुण्ड, दानभारि, शबर, उद्भस, वत्स, पौण्ड्र, पिशाच, पुण्ड्र, कुण्डीविष, मारुत, धेनुक,तगंण, परतगंण आदि-आदि देश शामिल हुए।

प्रमुख योद्धा :: भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, मद्रनरेश शल्य, भूरिश्र्वा, अलम्बुष, कृतवर्मा, कलिंगराज श्रुतायुध, शकुनि, भगदत्त, जयद्रथ, विन्द-अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण, बृहद्वल, दुर्योधन व उसके 99 भाई, भीम, नकुल, सहदेव, अर्जुन, युधिष्टर, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, सात्यकि, उत्तमौजा, विराट, द्रुपद, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, पाण्ड्यराज, घटोत्कच, शिखण्डी, युयुत्सु, कुन्तिभोज, उत्तमौजा, शैब्य, अनूपराज नील।

तटस्थ दल :: विदर्भ, शाल्व, चीन, लौहित्य, शोणित, नेपाल, कोंकण, कर्नाटक, केरल, आन्ध्र, द्रविड़ आदि ने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।

सेना विभाग :: पाण्डवों और कौरवों ने अपनी सेना के क्रमशः 7 और 11 विभाग अक्षौहिणी में किये। एक अक्षौहिणी में 21,870 रथ, 21,870 हाथी, 65,610 सवार और 1,09,350 पैदल सैनिक होते हैं। हर रथ में चार घोड़े और उनका सारथि होता है, हर हाथी पर उसका हाथीवान बैठता है और उसके पीछे उसका सहायक जो कुर्सी के पीछे से हाथी को अंकुश लगाता है, कुर्सी में उसका योद्धा धनुष-बाण से सुसज्जित होता है और उसके साथ उसके दो साथी होते हैं, जो भाले फेंकते हैं। तदनुसार जो लोग रथों और हाथियों पर सवार होते हैं, उनकी सँख्या 2,84,323 होती है। एक अक्षौहिणी सेना में समस्त जीवधारियों-हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों की कुल सँख्या 6,34,243 होती है। इस प्रकार 18 अक्षौहिणी सेना में समस्त जीवधारियों-हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों-की कुल सँख्या  1,14,16,374 होटी है अर्थात 3,93,660 हाथी, 2755620 घोड़े, 82,67,094 मनुष्य।

महाभारत युद्ध में भाग लेने वाली कुल सेना  ::

कुल पैदल सैनिक :: 19,68,300,

कुल रथ सेना :: 3,93,660,

कुल हाथी सेना :: 3,93,660,

कुल घुड़सवार सेना ::  11,80,980,

कुल न्यूनतम सेना :: 39,06,600,

कुल अधिकतम सेना ::  1,14,16,374.

(323 ईसा पूर्व चन्द्रगुप्त की सेना में 30,000 रथ, 9,000 हाथी तथा 6,00,000 पैदल सैनिक थे।  कुल सेना उस समय 6,39,000 के आस पास थी)

हथियार और युद्ध सामग्री :: प्रास, ऋष्टि, तोमर, लोहमय कणप, चक्र, मुद्गर, नाराच, फरसे, गोफन, भुशुण्डी, शतघ्नी, धनुष-बाण, गदा, भाला, तलवार, परिघ, भिन्दिपाल, शक्ति, मुसल, कम्पन, चाप, दिव्यास्त्र, एक साथ कई बाण छोड़ने वाली यांत्रिक मशीनें।

The weapons were more dangerous than the present arms, even more powerful than the atomic, hydrogen, neutron bomb of today. The scriptures contain the knowledge of these arms & ammunition in hand written books written with golden ink. The temples and ancient Brahmn families traditionally pass on these books to their decedents.

योद्धाओं के पद :: युद्ध के अन्तर्गत योद्धाओं को महारथी, रथी, अतिरथी आदि नामों से उनकी बल, शक्ति, क्षमता का अनुरूप पुकारा जाता था।

रथी RATHI :: 5,000 सैनिकों का संचालन करने में सक्षम-समर्थ ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने युद्ध में हार कम ही देखी थी। ये ऐसे योद्धा थे जो किसी भी क्षण उत्साह और आवेश मे आकर बड़े से बड़े युद्ध का पासा पलट देने की क्षमता रखते थे। ये योद्धा अपने-अपने युद्ध कौशल में प्रवीण तथा श्रेष्ठ थे।

A warrior capable of attacking 5,000 warriors simultaneously.

Kaurav’s side :: दुर्योधन, अलम्बुष, कृपाचार्य, जयद्रथ, सुदक्षिण, बृहद्वल, श्रुतायुध आदि वीर युद्ध कला में पूर्ण रुप से पारंगत और प्रवीण थे, परन्तु इनके पास  श्रेष्ठ दिव्यास्त्र नही थे।

Sudakshin-the ruler of the Kamboj, Shakuni, King of Gandhar and maternal uncle of Kauravs,  Duryodhan’s son Lakshman and the son of Dushasan, Jay Drath, the king of the Sindhu and brother in law of Kauravs, all 99 brothers of Duryodhan, including Dushasan, were  Rathi. Duryodhan was a warrior equivalent to 8 Rathi.

Pandav’s side :: उत्तमौजा, शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, शल्य, द्रुपद, द्रुपद के पुत्र, युधिष्टर, नकुल-सहदेव, भीम, घटोत्कच।

Uttamauja,  Shikhandi, sons of Panchal-Drupad, Yudhishtar the son of Pandu and Kunti, Nakul and Sah Dev, Bhima is regarded as equivalent to 8 Rathi-however he was more powerful than Duryodhan with strength of 10,000 elephants.

अतिरथी ATI RATHI :: 60,000 सैनिकों का संचालन करने में सक्षम-समर्थ योद्धा जिसके अधीन 12 रथी होते थे। भीम, कर्ण, जरासंध, सात्यकि, कृतवर्मा, भूरिश्र्वा, अश्वत्थामा, अभिमन्यु।

ये ऐसे योद्धा थे जिन्होने युद्ध में पराजय का सामना बहुत कम किया था। इनके पास भी दिव्यास्त्रों की कमी नहीं थी, परन्तु अति विशेष दिव्यास्त्र जैसे पाशुपत अस्त्र आदि की प्रधानता भी नहीं थी। ये सब युद्ध कला में पूर्ण रुप से पारंगत और प्रवीण थे तथा भारतवर्ष के कई जनपदों को युद्ध में परास्त कर चुके थे।

A warrior capable of contending with 12 Rathi class warriors or 60,000 warriors, simultaneously.

Kaurav’s side :: Bhoj, Krat Varma, Madr Naresh Shaly, Bhurishrava-the son of Som Datt, Krapachary, the son of Saradwat.

Pandav’s side :: Satyaki of the Vrashni race-clan, Dhrasht Dhyumn-the divine son of Drupad, Kunti Bhoj-the maternal uncle of Pandavs, Ghatotkach-master of all illusions &  son of Bhim and Hidimba.

महारथी MAHA RATHI :: वह समर्थ योद्धा-सेनापति जिसके अधीन 7,20,000 सैनिकों का संचालन करने में सक्षम, जिसके अधीन 12 अतिरथी होते थे। भगवान् श्री कृष्ण, अर्जुन, भीष्म पितामह, बलराम जी, गुरु द्रोणाचार्य, भगदत्त ऐसे योद्धा थे, जो युद्ध में कभी पराजित नहीं हुए। इनके पास दिव्यास्त्रों की कमी नहीं थी और अपनी अपनी युद्ध कला मे पूर्ण रुप से पारंगत और प्रवीण तथा सबसे अच्छे थे। ये देवताओं को भी पराजित कर सकते थे जैसा कि अर्जुन और श्रीकृष्ण ने कई बार किया और यहाँ तक कि भगवान शिव को भी युद्ध मे सन्तुष्ट किया। पितामह भीष्म ने भी परशुराम जी को पराजित किया था और भगदत्त तो इन्द्र का मित्र था, उसने भी अनेकों बार देवासुर संग्राम में देवताओं की सहायता की थी।

A commander-warrior capable of fighting 12 Ati Rathi class warriors or 7,20,000 warriors simultaneously and having complete mastery of all forms of weapons and combat skills.

Kaurav’s side :: Alambhush, the Chief of Rakshas-demons, The ruler of Prag Jyotish Pur, Bhag Datt, Vrash Sen, the son of Karn, Guru Dron.

Ashwatthama is the son of guru Dron and an incarnation of Bhagwan Shiv. He was classified as a Maha Rathi but in reality he was peerless and had the traits of Bhagwan Shiv in battle field. Pitamah Bhishm believed that he had to be furious to unleash his full potential.

Karn was equivalent to 2 Maha Rathi.

Bhishm Pitamah, even though he never classified himself. Later it was revealed that Bhishm Pitamah was much more powerful than  to 2 Maha Rathi warriors.

Pandav’s side :: Virat, Drupad-the King of Panchal (present Punjab till Lahore), Dhrast Ketu-the son of Sishu Pal, Chedi Raj. All sons of Draupadi were Maha Rathi, Abhimanyu-Arjun’s son was  equivalent to 2 Maha Rathi.

Arjun was much more than 2 Maha Rathi, had he used the divine weapons acquired by him from heaven. He himself was Nar an incarnation of Bhagwan Vishnu and associate of Narayan in Badrikashrm. He had pleased Bhagwan Shiv and was capable of countering Ashwatthama as well, which he proved later by repelling Brahmastr used by Ashwatthama. He was under the protection of Hanuman Ji Maha Raj-an incarnation of Bhagwan Shiv, Bhawan Shri Krashn-the Almighty and Dev Raj Indr.

सैन्य संरचनाएँ :: प्राचीन काल में युद्ध में सेनापति के द्वारा सैन्य सञ्चालन हेतु व्यूह रचना की जाती थीताकि शत्रु सेना में आसानी से प्रवेश किया जा सके तथा राजा और मुख्य सेनापतियों को बन्दी बनाया या मारा जा सके। इसमें अपनी सम्पूर्ण सेना को व्यूह के नाम या गुण वाली एक विशेष आकृति मे व्यवस्थित किया जाता है। इस प्रकार की व्यूह रचना से छोटी से छोटी सी सेना भी विशालकाय लगने लगती हैं और बड़ी से बड़ी सेना का सामना कर सकती है, जैसा कि महाभारत के युद्ध में पाण्डवों की केवल 7 अक्षौहिणी सेना ने कौरवों की 11 अक्षौहिणी सेना का सामना करके, यह सिद्ध कर दिखाया।

महाभारत युद्ध की तिथियाँ :: युद्ध के प्रथम दिन मृगशीरा नक्षत्र था। युद्ध आरम्भ होने के 13 वें दिन पुष्‍य नक्षत्र था। अश्‍विन और कार्तिक मास थे। भगवान श्री कृष्ण  रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल में लगभग 3112 ईसा पूर्व अर्थात आज से लगभग 5129 वर्ष पूर्व प्रकट हुए थे। रामायण और महाभारत के घटनाक्रम में 17,50,000 वर्ष का भेद-अन्तर है।

युद्धारम्भ :: अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्ण से अपने रथ दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलने को कहा ताकि वो दोनों सेनाओं और योद्धों का मूल्यांकन कर सकें। जब अर्जुन युद्ध क्षेत्र में अपने गुरु द्रोण, पितामह भीष्म एवं अन्य संबंधियों को देखा तो वे बहुत शोकग्रस्त एवं उदास हो गये। उन्होंने भगवान् श्री कृष्ण से कहा कि जिनके हित के लिये वह युद्ध लड़ा जाना था वे तो युद्ध क्षेत्र में उसी राजभोग की प्राप्ति के लिये उनके विपक्ष मे खड़े थे। उन्हें समाप्त करके सुख प्राप्ति किस काम की !? उन्होंने युद्ध की अनिच्छा प्रकट की और धनुष रखकर रथ के पिछले भाग में बैठ गये। भगवान् श्री कृष्ण योग में स्थित होकर उनके माध्यम से संसार को गीता का उपदेश दिया।

Please refer to SHRIMAD BHAGWAD GEETA (1) श्रीमद् भगवद्गीता “अथ प्रथमोSध्याय:”to  SHRIMAD BHAGWAT GEETA (18) श्रीमद्भागवत गीता ***अथ अथाष्टादशोSध्याय:***SIGNIFICANCE & EXTRACT OF GEETA गीता का महात्म्य व सारover santoshkipathshala.blogspot.com & hindutv.wordpress.com

संसार में जो आया है उसको एक ना एक दिन जाना ही पड़ेगा। यह शरीर और संसार दोनों नश्वर हैं परन्तु इस शरीर के अन्दर रहने वाली आत्मा शरीर के मरने पर भी नहीं मरती। जिस तरह मनुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर नये वस्त्र पहनता है, उसी प्रकार आत्मा भी पुराना शरीर त्याग कर नया शरीर धारण करती है, इसको तुम ऐसे समझो कि यह सब प्रकृति तुम से करवा रहीं है तुम केवल निमित्त मात्र हो। भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग तीनों की शिक्षा दी जिसके परिणाम स्वरूप संसार दुष्टों के बोझ से मुक्त हो सका। घटनाक्रम ::

1st DAY पहला दिन :: पहले दिन की समाप्ति पर पाण्डव पक्ष को भारी हानि उठानी पड़ी। विराट नरेश के पुत्र उत्तर और श्वेत क्रमशः शल्य और भीष्म के द्वारा मारे गये। उनके कई सैनिकों का वध कर दिया गया। अर्जुन-धृष्ट धयुम्न ने वज्र व्यूह का प्रयोग किया, जबकि भीष्म पितामह द्वारा सर्वतोमुखी दण्ड व्यूह का आयोजन किया गया। यह दिन कौरवों के उत्साह को बढ़ाने वाला था। इस दिन पाण्डव किसी भी मुख्य कौरव वीर को नहीं मार पाये।

VAJR VYUH (thunderbolt, diamond) वज्र व्यूह :: Vajr is the weapon used by Dev Raj Indr against the demons, made by Dev Shilpi Vishwkarma from the boons of Rishi Dadhichi who had swallowed all weapons (Astr, Shastr) of Demigods for their protection. The Vajr is essentially a type of club with a ribbed spherical head. The ribs may meet in a ball-shaped top or they may be separate and end in sharp points with which to stab.

All Maha Rathi acquired the central square positions surrounded by the infantrymen on all sides. Dhrast Dhyumn was appointed the supreme commander of the army.

2nd DAY दूसरा दिन :: इस दिन पाण्डव पक्ष की अधिक क्षति नहीं हुई, द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न को कई बार हराया और उसके कई धनुष काट दिये, भीष्म द्वारा अर्जुन और भगवान् श्री कृष्ण को कई बार घायल किया गया, यह दिन कौरवों के लिये भारी पड़ा। इस दिन भीम का कलिंगों और निषादों से युद्ध हुआ तथा भीम द्वारा सहस्रों कलिंग और निषाद मारे गये।  अर्जुन ने भी पितामह भीष्म को भीषण संहार मचाने से रोके रखा।

सेनापति धृष्ट धयुम्न ने क्रौंच व्यूह और भीष्म पितामह ने गरुड़-व्यूह की रचना की।

KRAUNCH-HERON VYUH क्रौंच व्यूह :: Kraunch is a Bird with a sharp pointed beak. Pandav’s arranged-organised their forces in Kraunch formation on the second day. Drupad was at the head and Kunti Bhoj was placed at the eye. The army of the Satyaki formed neck of the Kaunch bird. Bhim and Dhrast Dhyumn formed both the wings of the Vyuh. Bhim moved freely in and out of the formation and put Kaurav forces to a great loss. The sons of Draupadi and Satyaki were to guard the wings. The formation of the army phalanxes in this manner was very formidable.

Bhishm Pitamah also decided to arrange his army in Kraunch Vyuh. Bhurishrava and Shaly were to guard the wings. Som Datt, Ashwatthama, Krap and Krat Varma were positioned at different important place in the formation.

GARUD (Eagle) VYUH FORMATION गरुड़ व्यूह :: Garud Ji is the carrier of Bhagwan Shri Hari Vishnu. Hanuman Ji brought Garud Ji to Shri Lanka when Bhagwan Shri Ram was tied by Nag Pash, who in turn torned away the Pash. Bhagwan Shri Krashn too fought a battle with Dev Raj Indr riding Garud Ji along with Saty Bhama. Eagle formation, rhomboid with far-extended wings.

Bhishm Pitamah organised his artillery on the second & third day of the war as per this formation-intricate web. He positioned himself at the beak. Dron and Krat Varma were the eyes. Krap and Ashwatthama were at the head. The Trigart the Jay Drath with their armies made the neck. Duryodhan, his brothers, Vind and Anu Vind made the body. King of Kaushal, Brahad Bal constituted the tail.

3rd DAY तीसरा दिन :: इस दिन भीम ने घटोत्कच के साथ मिलकर दुर्योधन की सेना को युद्ध से भगा दिया। भीष्म पितामह ने दुर्योधन के ताने-उलाहने, उकसाने के बाद भीषण नर संहार किया। भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को भीष्म वध करने को कहा, परन्तु अर्जुन उत्साह पूर्वक युद्ध नहीं पाये, जिस वज़ह से भगवान् श्री कृष्ण स्वयं उन्हें मारने के लिये, रथ का पहिया उठाकर, अपनी शर्त भंग करके, उद्धत हुए। ऐसा उन्होंने पितामह भीष्म को उनकी प्रतिज्ञा की निरर्थकता समझाने लिए किया। अर्जुन ने उन्हें पैर पकड़ कर रोका और कौरव सेना का भीषण संहार करते हुए एक दिन में ही समस्त प्राच्य, सौवीर, क्षुद्रक और मालव क्षत्रिय गणों को मार गिराया।

भीष्म पितामह ने गरुड़-व्यूह की रचना की।

ARDH CHANDR (अर्धचन्द्र व्यूह LUNAR HALF CRESCENT) FORMATION :: Arjun adopted this arrangement in consultation with Dhrast Dhyumn. At the right end was Bhim occupied the right end. Along the elevation armies of Drupad and Virat were positioned. Neel, Dhrast Ketu, Dhrast Dhyumn and Shikhandi were placed next to them. Yudhishtar occupied the centre. Satyaki and five sons of Draupadi Abhimanyu were at left end, Ghatotkach and Kokaya brother was also present there. At the tip of it Arjun had his Chariot driven by Bhagwan Shri Krashn.

4th  DAY चौथा दिन :: इस दिन कौरवों ने अर्जुन को अपने बाणों से ढक दिया, परन्तु अर्जुन ने सभी को मार भगाया। भीम ने तो इस दिन कौरव सेना में हाहाकार मचा दी, दुर्योधन ने अपनी गजसेना भीम को मारने के लिये भेजी परन्तु घटोत्कच की सहायता से भीम ने उन सबका नाश कर दिया और 14 कौरवों को भी मार गिराया, परन्तु राजा भगदत्त द्वारा जल्द ही भीम पर नियंत्रण पा लिया गया। बाद में भीष्म को भी अर्जुन और भीम ने भयंकर युद्ध कर कड़ी चुनौती दी।

भीष्म पितामह ने सेनाओं को मंडल व्यूह में सुनियोजित किया और अर्जुन ने श्रीन्गातका व्यूह (कौरव सेना के मंडल व्यूह के प्रत्युत्तर में पांडवों द्वारा इस व्यूह को रचा गया था।) का आयोजन किया। इसी युद्ध में दूसरी बार भीष्म पितामह ने व्याल व्यूह और अर्जुन ने वज्र व्यूह का इस्तेमाल किया।

5th DAY पाँचवाँ दिन :: भीष्म पितामह ने पाण्डव सेना को अपने बाणों से ढक दिया। उन पर रोक लगाने के लिये क्रमशः अर्जुन और भीम ने उनसे भयंकर युद्ध किया। सात्यकि ने द्रोणाचार्य को भीषण संहार करने से रोके रखा। भीष्म पितामह द्वारा सात्यकि को युद्ध क्षेत्र से भगा दिया गया। भीष्म पितामह ने मकर व्यूह की रचना की और अर्जुन ने श्येन व्यूह के द्वारा इसका प्रतिकार किया।

6th DAY छठा दिन :: इस दिन भी दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध चला। युद्ध में बार बार अपनी हार से दुर्योधन क्रोधित होता रहा और भीष्म पितामह उसे आश्वासन देते रहे। भीष्म पितामह द्वारा पांचाल सेना का भयंकर संहार किया गया। उन्होंने सेनाओं का आयोजन क्रौंच व्यूह में किया और पांडवों ने धृष्ट धयुम्न के नेतृत्व में मकर व्यूह का प्रयोग किया।

अभिमन्यु ने अपने क्षेत्र में सूचि व्यूह (Long line, needle formation) का आयोजन किया।

7th  DAY सातवाँ दिन :: अर्जुन कौरव सेना में भगदड़ मचा दी। धृष्टद्युम्न ने दुर्योधन को युद्ध में हरा दिया।अर्जुन पुत्र इरावान ने विन्द और अनुविन्द को हरा दिया। भगदत्त ने घटोत्कच को और नकुल सहदेव ने शल्य को युद्ध क्षेत्र से भगा दिया। भीष्म पितामह ने पाण्डव सेना का भयंकर संहार किया। भीष्म पितामह ने मंडल व्यूह और अर्जुन ने वज्र व्यूह की रचना की।

MANDAL VYUH  (Cyclic, Galaxy) FORMATION :: Bhishm Pitamah organised the artillery as per Mandal Vyuh, positioning him self at its centre. It was circular formation & very difficult to penetrate. The Pandavs countered it by Vajr Vyuh.

8th  DAYआठवाँ दिन :: भीष्म पितामह ने पाण्डव सेना का भयंकर संहार किया। भीमसेन ने धृतराष्ट्र के आठ पुत्रों का वध किया। राक्षस अम्बलुष ने अर्जुन पुत्र इरावान का वध किया। एक बार पुनः घटोत्कच ने दुर्योधन को अपनी माया द्वारा प्रताड़ित कर युद्ध से उसकी सेना को भगा दिया तो भीष्म पितामह की आज्ञा से भगदत्त ने घटोत्कच को हरा कर भीम, युधिष्ठिर व अन्य पाण्डव सैनिकों को पीछे ढकेल दिया। दिन के अंत तक भीमसेन ने धृतराष्ट्र के नौ और पुत्रों का वध कर दिया। देता है। भीष्म पितामह ने कुर्म व्यूह तथा अर्जुन ने त्रिशूल व्यूह की रचना की। कुछ काल पश्चात भीष्म पितामह ने सेनाओं को उर्मि व्यूह के अनुरूप सजाया तो अर्जुन ने भी व्यूह रचना बदल कर श्रीन्गातका व्यूह कर दी।

9th  DAY नौवाँ दिन :: दुर्योधन ने भीष्म पितामह से को या तो कर्ण को युद्ध करने की आज्ञा देने के लिये या फिर पाण्डवों का वध करने के लिये आग्रह किया-दबाब डाला। भीष्म पितामह ने उसे आश्वासन देते हुए कहा कि अगले दिन या तो भगवान् श्री कृष्ण अपनी युद्ध मे शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा तोड़ेंगे अथवा वे किसी एक पाण्डव का वध अवश्य होगा। आखिरकार भीष्म पितामह के द्वारा भीषण नर संहार को रोकने के लिये भगवान् श्री कृष्ण ने अपनी शर्त को एक तरफ रखते हुए रथ का पहिया उठा लिया। युद्ध में अर्जुन पितामह के प्रति अपने अत्यधिक लगाव और सम्मान के कारण कमजोर पद रहे थे तो पितामह को पिता शान्तनु का इच्छा मृत्यु का वरदान बचा रहा था। पितामह ने सर्वतोभद्र व्यूह की रचना की थी और जबाब में अर्जुन ने नक्षत्र मण्डल व्यूह का आयोजन किया था।

SARTO BHADR (Safe from all sides) VYUH ::  The formation included square array in which the troops faced all the points of the compass. Pitamah Bhishm acquired the front, Guarded by Krap, Krat Varma, Shakuni, Jay Drath, Kamboj and sons of Dhratrashtr. Trigart were also present there.

The Pandavs arranged columns in Galaxy-constellation form. The Pandavs and sons of Draupadi were leading from the front. Shikhandi, Chekitan and Ghatotkach were holding important positions to defend. Abhimanyu, Kekaey brothers and Drupad were guarding the rear.

 10th DAY दसवाँ दिन :: भीष्म पितामह ने भी पांचाल तथा मत्स्य सेना का भयंकर संहार किया तो भगवान् श्री कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने शिखण्डी को आगे कर पितामह भीष्म के शरीर को बाणों से ढक दिया। अंत में अर्जुन के बाणों से विदीर्ण हो बाणों की उस शय्या पर लेट गये। उनके गिरते ही युद्ध रोक दिया गया। पितामह भीष्म से उनकी मुत्यु का भगवान् श्री कृष्ण के साथ अर्जुन ने उनके शिविर में विगत रात्रि को पूछा था। पितामह ने असुर (Asur-Demons Formations) व्यूह की रचना की थी, जिसके जबाब में अर्जुन ने देव व्यूह रचना की थी।

DEV (Demigods) VYUH देव व्यूह :: Pandavs countered Kauravs Asur Vyuh with it. In the lead was Shikhandi with Bhim and Arjun to protect his sides. Behind him were Abhimanyu and the children of Draupadi. Satyaki and Dhrast Dhyumn were with them. Virat and Drupad too  had charge of the rest of the army. Kekaey brothers, Dhrast Ketu and Ghatotkach were in their ranks. The Pandavs had the single pointed aim to disable-neutralise Bhishm Pitamah, since he could not be killed unless he desired for it. Shikhandi was made to stand in front of Arjun and under vow Pitamah avoided shooting at him, since he was fully aware of Shikhandi’s previous birth and he still considered him a woman, who wanted to marry him.

11th DAY ग्यारहवाँ दिन :: कर्ण के कहने पर आचार्य द्रोण को सेनापति बनाया गया। कर्ण भी युद्ध क्षेत्र में आ गया जिससे कौरवों का उत्साह कई गुणा बढ़ गया। दुर्योधन और शकुनि आचार्य द्रोण से कहा कि वे युधिष्ठिर को बन्दी बना लें तो युद्ध अपनेआप खत्म हो जायेगा। जब दिन के अंत में आचार्य द्रोण युधिष्ठिर को युद्ध में हरा कर उसे बन्दी बनाने के लिये आगे बढे तो अर्जुन ने आगे बढ़कर अपने बाणों की वर्षा से उन्हे रोक दिया। कर्ण ने भी पाण्डव सेना का भारी संहार किया। कौरव पक्ष ने शकट व्यूह की रचना की। पाण्डवों ने क्रौंच व्यूह चुना।

12th DAY बारहवाँ दिन :: पिछले दिन अर्जुन के कारण युधिष्ठिर को बन्दी न बना पाने के कारण शकुनि व दुर्योधन ने त्रिग‍र्त देश के राजा को अर्जुन से युद्ध कर उन्हें वहीं व्यस्त रखने को कहा ताकि आचार्य द्रोण युधिष्ठिर को बंदी बना सकें। युधिष्टर को बंदी बना लिये जाने  अवस्था में युद्ध स्वतः ही समाप्त हो जाता। मगर भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन ने उनकी यह चाल भी विफल कर दी।  आचार्य द्रोण ने गरुड़ व्यूह और अर्जुन ने अर्धचन्द्र व्यूह की रचना की।

13th DAY तेरहवाँ दिन :: दुर्योधन ने राजा भगदत्त को अर्जुन को व्यस्त बनाये रखने को कहा। भगदत्त ने युद्ध में एक बार फिर से भीम को हरा दिया। भगदत्त ने अर्जुन के साथ भयंकर युद्ध करते हुए वैष्णवास्त्र का प्रयोग किया जो कि रथ पर सवार भगवान् श्री कृष्ण के कारण स्वतः ही निष्फल हो गया। अन्ततः अर्जुन ने भगदत्त का वध कर दिया। देता है।

इसी दिन आचार्य द्रोण युधिष्ठिर को बंदी बनाने के हेतु फिर से चक्र व्यूह की रचना की और अर्जुन को युद्ध क्षेत्र में अन्यत्र व्यस्त रखने का प्रयोजन किया। पाण्डव सेना में चक्र व्यूह को भेदना केवाल अर्जुन को ही आता था। अभिमन्यु ने गर्भ में चक्र व्यूह में प्रवेश करना तक सीखा जब अर्जुन सुभद्रा को चक्र व्यूह की रचना और भेदन समझा रहे थे। उन्हें नींद आ जाने की वजह से अभिमन्यु उसमें घुसना तो सीख गये परन्तु निकलना नहीं सीख पाये। युधिष्ठिर ने भीम आदि को उसके साथ भेजा, परन्तु चक्र व्यूह के द्वार पर वे सब के सब जयद्रथ द्वारा भगवान् शिव के वरदान के कारण रोक दिये गये। केवल अभिमन्यु ही प्रवेश कर पाये और कौरव महारथियों ने उनकी नियम विरुद्ध हत्या कर दी। अभिमन्यु का अन्याय पूर्ण तरीके से वध हुआ देख अर्जुन ने जयद्रथ का वध करने और ऐसा न कर पाने पर अग्नि समाधि लेने की प्रतिज्ञा की कहता है।Image result for vYUH ARMY COLUMNS

CHAKR VYUH चक्र व्यूह :: Guru Dron arranged his army in wheel formation. Duryodhan occupied the centre. Jay Drath was positioned at the entrance. Warriors formed concentric circles.

It had six concentric circles under the six Maha Rathi & stalwarts (Karn, Dron, Ashwatthama, Dushashan, Shaly, Krapachary). Abhimanyu easily penetrated the first gate and caused turmoil in the Kaurav army fighting fiercely like his father. The stalwarts of Kauravs became ineffective against him and decided to kill him against the rules of war striking at him altogether.

Bhim, Yudhishtar, Shikhandi, Drupad, Dhrast Dhyumn, Virat, Nakul etc. failed to enter the composition. Jay Drath had obtained a boon from Bhagwan Shiv for his protection which he misused at this juncture and beheaded Abhimanyu.

14th DAY चौदहवाँ दिन :: अर्जुन की अग्नि समाधि वाली बात सुनकर कौरव उत्साहित हो गये और युद्ध में जयद्रथ को बचाने के लिये तत्पर हो गये। आचार्य द्रोण ने चक्र शकट व्यूह की रचना की और जयद्रथ सेना के पिछले भाग मे छिपा दिया। भगवान् श्री कृष्ण ने माया से दिन में ही रात्रि का अँधेरा उत्पन्न कर दिया जिससे उत्साहित होक जयद्रथ सामने आ गया। अर्जुन ने जयद्रथ को मारकर उसका मस्तक उसके पिता की गोद में गिरा दिया। आचार्य द्रोण ने द्रुपद और विराट को मार दिया।

पाण्डवों ने पद्म-कमलव्यूह, सूचि व्यूह और खड्ग सर्प व्यूह आयोजन किया।

Arjun was under oath to  kill Jay Drath. Guru Dron made a triple layered Vyuh. First was the Chakr Vyuh where he was standing himself. It opened in to the second Shakat Vyuh the charge of which was in the hands of Dur Marshan, the brave brother of Duryodhan. The third tier was the Suchi Mukh Vyuh (shaped like the mouth of a needle) with Karn, Bhurishrava, Ashwatthama, Shaly, Vrash Sen, Krap to guard it and Jay Drath was at the very end of the Vyuh.

15th DAY पन्द्रहवाँ दिन :: पाण्डवों ने द्रोणाचार्य को अश्वत्थामा की मृत्यु का विश्वास दिला दिया, जिससे निराश हो आचार्य द्रोण रथ पर ही आसन लगा कर बैठ गये और धृष्टद्युम्न ने उनका सिर काट दिया। आचार्य ने पद्म व्यूह की रचना की थी।

16th DAY सोलहवाँ दिन :: कर्ण कौरव सेना का मुख्य सेनापति बनाया गया। उनसे पाण्डव सेना का भयंकर संहार किया नकुल सहदेव को युद्ध मे हरा दिया मगर कुंती को दिये वचन का सम्मान करते हुए  उनके प्राण नहीं हरे। उसका अर्जुन के साथ भी भयंकर संग्राम हुआ। भीम दुःशासन का वध कर उसकी छाती का रक्त अंजलि में भरकर निकला मगर पीया नहीं और उस रक्त को द्रौपदी के बालों में लगाया। कर्ण ने मकर व्यूह और अर्जुन ने अर्धचन्द्र व्यूह की रचना की।

17th DAY सत्रहवाँ दिन ::  कर्ण ने भीम और युधिष्ठिर को हरा कर कुंती को दिये वचन को स्मरण कर उनके प्राण नहीं लिये। अन्ततः अर्जुन ने कर्ण के रथ के पहिये के भूमि में धँस जाने पर, भगवान् श्री कृष्ण के कहने पर रथ के पहिये को निकाल रहे कर्ण का उसी अवस्था में वध कर दिया और  कौरव हताश हो गये। फिर शल्य को प्रधान सेनापति बनाया गया परन्तु उनको भी युधिष्ठिर ने दिन के अंत में मार गिराया। कर्ण ने सूर्य व्यूह व्यूह और अर्जुन ने महिष व्यूह की रचना की।

18th DAY अठारहवाँ दिन :: भीम ने दुर्योधन के बचे हुए भाइयों को मार गिराया। सहदेव ने शकुनि का नाश किया। अपनी पराजय हुई जान दुर्योधन एक तालाब मे छिप गया। पाण्डवों द्वारा ललकारे जाने पर वह भीम से गदा युद्ध के लिये बाहर आ गया। भगवान् श्री कृष्ण के इशारा किये जाने पर उन्होंने दुर्योधन की जाँघ पर बार किया। उसकी जाँघ गान्धारी के दृष्टि पात न होने के कारण वज्र के समान होने से रह गई थी। कौरव तो युद्ध की समस्त मर्यादायें अभिमन्यु की हत्या करके पाण्डवों को नियम पालन के दायित्व से पहले ही मुक्त कर चुके थे। दुर्योधन ने उनके प्रस्थान के बाद अश्वत्थामा और कृपाचार्य के आने के बाद मरने से पहले अश्वत्थामा को सेनापति नियुक्त कर दिया और अश्वत्थामा ने रात शिविर में घुसकर द्रौपदी के पुत्रों की हत्या कर दी। भगवान् शिव ने उन्हें ऐसा करने को प्रोत्साहित किया। भगवान् शिव तो पाण्डवों को भी नष्ट करना चाहते थे मगर परमात्मा श्री कृष्ण के आगे उनकी एक भी नहीं चली। शल्य ने सर्वतो भद्र व्यूह का प्रयोग किया।

यतश्च भयमाशङ्केत्ततो विस्तारयेद् बलम्। पद्मेन चैव व्यूहेन निविशेत सदा स्वयम्॥मनु स्मृति 7.188

युद्ध मार्ग में राजा दण्ड व्यूह, शकट व्यूह, वराह व्यूह, सूचि व्यूह या गरुड़ व्यूह चले।

The king adopt Dand Vyuh, Shakat Vyuh, Varah Vyuh, Suchi Vyuh or Grud Vyuh, five types of formations of columns of army which ensures protection from the attack by the enemy if gets information of the invasion.

The troops may acquire staff formation (i.e. in an oblong), wagon (i.e. in a wedge), boar (i.e., in a rhombus), pin (i.e. in a long line) or like a Garud-Bhagwan Vishnu’s carrier in the form of a bird, (i.e. in a rhomboid with far-extended wings). [मनु स्मृति 7.188-198]

ईशा उपनिषद श्लोक में व्यूह शब्द का प्रयोग भगवान् सूर्य की किरण रश्मियों के पुँज द्वारा ब्रह्माण्ड को प्रकाशित-आलोकित करने के संदर्भ में है। प्रजापति पुत्र भगवान् सूर्य से प्रार्थना की गई है कि वे संसार को प्रकाशित करें।

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मिन्समूह।  

तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि॥ईशा उपनिषद 16॥

Vyuh is describing configuration-set up in which the rays of Sun moves to the universe. They keep on changing in form, causing eruptions, calamities, rains famine, disasters over the earth and other planets.

ARTILLERY COLUMNS  महाभारत युद्ध में व्यूह रचनाएँ :: महाभारत के 18 दिन के युद्ध में दोनों पक्ष के सेनापतियों द्वारा बनाये गए व्यूह  :: (1). गरुड़-व्यूह Eagle or Hawk Formation, (2). क्रौंच व्यूह Heron Formation, (3). श्येन व्यूह, (4). सुपर्ण व्यूह, (5). सारंग व्यूह, (6). सर्प व्यूह Snake Formation, (7). खड्ग सर्प व्यूह Sword Formation, (8). शेषनाग व्यूह Shesh Nag Formation, (9). मकर व्यूह Makar-Crocodile (Alligator) formation (two triangles, with the apices joined), (10). कूर्म (कछुआ) व्यूह Tortoise or turtle formation, (11). वराह व्यूह*** Bore-Pig Formation, (12). महिष व्यूह, (13). त्रिशूल व्यूह, (14). चक्र व्यूह, Wheel or Discus Formation, (15). अर्धचन्द्र व्यूह, (16). उर्मि व्यूह-सागर व्यूह Oormi-Ocean Formation, (17). त्रिशूल व्यूह Trident Formation, (18). मंडल व्यूह, (19). वज्र व्यूह, Vajr Vyuh (Diamond or Thunderbolt formation), (20). चक्र शकट व्यूह, (21). शकट व्यूह**, Box or Cart formation, (22). सर्वतोभद्र व्यूह, (23). शृंग घटक व्यूह, Horned Formation, (24). चन्द्रकाल व्यूह Crescent or Curved blade Formation,  (25). कमल व्यूह, Lotus Formation,  (26). देव व्यूह Demigods-Deities-Divine Formation, (27). असुर व्यूह Demon Formation, (28). सूचि व्यूह Needle Formation, (29). श्रीन्गातका व्यूह, (30). चन्द्र कला, (31). माला व्यूह Garland-Rosary Formation, (32). मंगल ब्यूह,  (33). सूर्य व्यूह, (34). दण्ड व्यूह*, (35). गर्भ व्यूह,  (36). शंख व्यूह, (37). मंण्डलार्ध व्यूह, (38). हष्ट व्यूह Hand Formation, (39). नक्षत्र मण्डल व्यूह Galaxy Formation, (40). भोग व्यूह, (41). प्रणाल व्यूह, (42). मण्डलार्द्ध व्यूह, (43).मयूर व्यूह, (44). असह्म व्यूह, (45). असंहत व्यूह, (46). विजय व्यूह  Victory Formation.

दण्ड* व्यूह Staff-Oblong Formation :: डंडे का आकार जिसमें आगे बलाध्यक्ष, बीच में राजा, पीछे सेनापित, दोनों ओर हाथी, हाथियों के बगल में घोड़े और घोड़ों के बगल में पैदल सिपाही रहते थे।

शकट** व्यूह Wagon in a wedge, Box, Cart Formation :: सैनिक व्यूह-रचना, जिसके दोनों पक्षों के बीच में सैनिकों की दोहरी पंक्तियाँ होती थीं।

वराह व्यूह*** :: सैनिक व्यूह-रचना, जिसमें अगला भाग पतला और बीच का भाग चौड़ा रखा जाता था।

HAWK FORMATION :: Arjun, Yudhishtar and Dhrast Dhyumn opted for Hawk formation of their Army. All the warriors of both sides were assigned to specific places in the formations with special responsibilities. Each formation was met by a counter formation by the other side. For instance, the Sarp-Serpent Vyuh was met with Garud-Eagle Vyuh. The Heron Formation was usually met with Garud or Eagle Formation.’Eagle is a Natural Enemy of Heron.

कुरुक्षेत्र युद्ध के परिणाम :: महाभारत एवं अन्य पौराणिक ग्रंथों के अनुसार यह युद्ध भारत वंशियों के साथ-साथ अन्य कई महान वंशों तथा वैदिक ज्ञान विज्ञान ह्रास हो गया।

यह युद्ध इतिहास का सबसे विध्वंसकारी और विनाशकारी युद्ध था। इस युद्ध के बाद भारत भूमि लम्बे समय तक वीर क्षत्रियों से विहीन रही। गांधारी के शापवश यादवों के वंश का भी विनाश हो गया। लगभग सभी यादव आपसी युद्ध में मारे गये, जिसके बाद भगवान् श्री कृष्ण ने भी इस धरती से प्रयाण किया।

इस युद्ध के समापन एवं भगवान् श्री कृष्ण के महाप्रयाण के साथ ही वैदिक सभ्यता और संस्कृति का ह्रास आरम्भ हुआ और  भारत से वैदिक ज्ञान और विज्ञान का लोप होने लगा और कलियुग का आरम्भ हो गया।

जनपदों की अर्थव्यवस्था बहुत खराब हो गयी, भारत में गरीबी के साथ साथ अज्ञानता फैल गयी।

महा भारत युद्ध के बाद भारत में निरन्तर शतियों तक विदेशियों और मलेच्छों के आक्रमण होते रहे। कुरुवंश के अंतिम राजा क्षेमक भी मलेच्छों से युद्ध करते हुए मारे गये। जिसके बाद आर्यावर्त सब प्रकार से क्षीण हो गया।कलियुग के बढ़ते प्रभाव को देखकर तथा सरस्वती नदी के लुप्त हो जाने पर लगभग 88,000 ऋषि-मुनि हिमालय चले गये और इस प्रकार भारतवर्ष ऋषि-मुनियों के ज्ञान एवं विज्ञान से भी हीन हो गया।

समस्त ऋषि-मुनियों के चले जाने पर धर्म का ह्रास होने लगा।  ढ़ोग, ढंकोसलों, पखण्डों, नर-पशु बलि को ही धर्म कहा जाने लगा।  मूर्ख, अज्ञानी स्वयं को विद्वान् कहकर ऊटपटाँग व्यवस्थाएँ  देने लगे। वेदों की  व्यख्याएं की जाने लगीं जो अभी भी जारी है। वेदों, शास्त्रों का उटपटांग रूपांतर, अनुवाद हो रहा है। मूर्ख लोग धर्म और राजनीति में अपना वर्चस्व बना रहे हैं।

यज्ञों का आयोजन दिखावे अपना कद बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।

उच्च वर्ण मलेच्छों का आचरण कर रहे हैं। शूद्र, मूर्ख अज्ञानी उच्च पदों पर आसीन हो रहे हैं। मुसलमानों और ईसाईयों ने देश को भृष्ट कर रखा है।

कलियुग के प्रभाव से ब्राह्मण वर्ग भी नहीं बचा है। अधिकांश दूषित एवं भ्रष्ट हो गये हैं और  मंत्रों का सही तरीके से उच्चारण करने की विधि तक नहीं जानते। इसी कारण वैदिक मंत्रों का दिव्य प्रभाव भी सीमित हो गया है। कुछ भ्रष्ट ब्राह्मणों ने समाज में कई कुरीतियाँ एवं प्रथाएँ चला दी हैं, जिनके परिणाम स्वरूप क्षुद्र एवं पिछड़े वर्ग ने स्वयं को दलित, पिछड़ा कहकर सर उठा रखा है। परन्तु कई ब्राह्मणों ने कठोर तप एवं नियमों का पालन करते हुए कलियुग के प्रभाव के बावजूद वैदिक सभ्यता को किसी न किसी अंश में जीवित रखा है। जिसके कारण आज भी ऋग्वेद एवं अन्य वैदिक ग्रंथ सहस्रों वर्षों बाद लगभग उसी रूप में उपलब्ध हैं।

मानव जाति को भगवान् श्री कृष्ण के कंठ से प्रकट हुई ज्ञानरूपी वाणी श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में प्राप्त हुई।

इस युद्ध के बाद युधिष्ठिर के राज्य-अभिषेक के साथ धरती पर धर्म के राज्य की स्थापना हुई।

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HINDU PHILOSOPHY (11) हिन्दु दर्शन शास्त्र :: NEO HINDUISM 

A faith healer, psychoanalyst, and marriage-love counsellor.

HINDU PHILOSOPHY (11)  हिन्दु दर्शन शास्त्र

NEO HINDUISM 

 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 

By :: Pt. Santosh Bhardwaj

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Its understood that if a Sawarn, higher-upper caste or Brahmn becomes a Brahmn only after under going various Sanskars, any one can become a Hindu, any where any time in the world, just by subjecting him self to the life style-order of a Hinduism. The thought that a Hindu is born, is absurd-meaningless.

The human child is helpless unlike the animal. He is taught to walk on his feet, if not he will walk-run like four limbed animals. He is taught how to speak, if not he will growl like cannibals-beasts. He is taught to became a civilised person, if not he will remain ignorant, uncivilised, barbarian. 

Learning is one of the most difficult-intricate task in the living world. Those who remain illiterate normally adopt for skilled jobs.

No one is authorised to expel or remove one-a follower of Hindu ideology from it. Those who said this or practiced this is ignorant, egoists and real enemies of Hinduism. Who ordered this in earlier times-medieval India, were wrong and on the wrong footing.

The Hinduism is like (icon to) the vast ocean of water from which water evaporates, takes the shape of cloud and rain here or there. Some of it forms, ice, mist, fog, rivers, ponds, lakes, drains, mountain cliffs etc. The ponds or lakes may dry out. The streams of water may merge to form a river and the river may merge with the ocean again. The drains may carry rain water or sludge or dirty water from the rivers.

The water from the rivers is used for irrigation, domestic, industrial purposes. The contaminated water from them reaches the rives again and after running for some distance is cleansed.

Similarly Hinduism is at the base of all religions-faiths.

Bhagwan Shri Hari Vishun-the nurturer, initially appeared as a golden shall in ocean water and then appeared as four armed form-incarnation of the Almighty. From his naval appeared Brahma Ji-the creator and from the forehead appeared Bhagwan Shiv i.e., Mahesh the destroyer. Brahma Ji created divine beings and from the divine beings mortals took birth. Maharshi Kashyap created the mortals from his wives. From the wives of Kashyap Rakshas, Demigods, humans animals and plants took birth. The progeny of the different wives led to different characterises in them. 

Four major groups of humans created by them were differentiated on the basis of chromosomes, genes in them. Those who took to learning became Brahmns, those who found it fit to fight became Kshtriy. Who adopted to agriculture trading, farming became Vaeshy. These three major categories utilised brain to one or the other level. Those who did not find it sound to study, fight or do business adopted to various skills. Either Brahma Ji or Kashyap did not create Brahmns, Kshatriy, Vaeshy or Shudr as such. Manu did not level any of them as such, he just mentioned how they performed, lived together in the society.

Amongest these groups Mallechh too are there, who made present Arab world, Jerusalem at the hub center. But Jews have their origin from one of Vrahaspati’s wives.

One of the 10 sons of Kashyap, Mishr moved to this region and educated them. This place is Mishr or present Egypt.

Till Mohammad or Isa Masih appeared on the center stage, all these were Hindus worshiping one or the other deity. Sufficient scientific and historical evidence is available to prove elaborate this. However, very very concerted effort is being made by the bigots to remove-destroy these evidences. Mohammad him self took the lead and thousands of images,idols, statues of demigods, deities and God were broken, disfigured, dis-created, turned to rubble and burred in side the soil. Still, the terrorist are busy in destroying monuments in entire Arab world, Syria, Iraq, Iran etc. Its certain that Islam will perish sooner or later like a dried lake.

Time and again incarnations of God punished the arrogant. Kapil Muni burnt off 10,00 sons of Sagar. Bhagwan Parshu Ram eliminated the Kshatriy 21 times. Bhagwan Shri Ram killed vast majority of Demons from the earth and some of them took shelter in Sutal Lok under King Bahu Bali. The tyrant-arrogant kings were punished by Bhagwan Shri Krashn himself during Maha Bharat. Those who survived too, were killed soon thereafter.

Jainism, Buddhism flourished and spreaded far and wide and ultimately shrunk. Kabir Panthis, Ravi Dasis, Arya Samajis, Dev Samajis, Dadu Panthi, Brahm Samajis, Brahm Kumaris; all sprung up like mush rooms and lost significance just like a dried pond. Sikhism sprung up to protect Hinduism and then turned into a sect demanding Khalistan. Shaevites and Vaeshnavs quarrelled for hundreds of years. Even today thousands of Akharas are there who reach Kumbh for Snan, Shahi Snan and quarrel for their dominance. Hinduism has room for all of them. They all have been accommodated. 

Neo Hinduism is neither a cult nor a sect, its just an approach to allow all the misguided, misled to get their identity back. No formality, no rituals, no purification or else.

Whenever a child is born in a bigot Muslim family the ring in the form of a skin covering over the pennies is removed, called Sunnat. The Mullah cried Allah in his ears and he becomes a Muslim. He is taught killing innocent animals in the name of sacrifice and its said that Manu Smrati favours meat eating, which is just to be fool the masses. Since his early child hood he is taught murder-killing. Later he becomes a rapist. He can marry any one in his family. No morals, virtues, culture, ethics, its all beast like behaviour. It works like a trade mark. Most of the mosques had been Hindu temples before being demolished, in the Arab world. Most of the rituals in one way or the other just destroyed versions of Hinduism. Even Kuran-Quran is a misspelled version of Puran. Ku of Kuran just means opposite, anti, reverse, reciprocal, reactionary. Pu of Puran is pure, pious, aesthetic, ethnic, virtuous.

The Christian is baptised in the Church.

The Sikh is converted by drinking a few drops of water saying Amrat chhuk litta hae (Elixir has been swallowed).

The Buddhist or Jain too under goes some ceremonies.

Arya Samaj was an effort aimed at improving Hinduism without understanding logic, reason, theme behind ritual, practices which have been proved correct scientifically in due course of time. There are traditions, practices which may be understood in future. Science itself is grossly imperfect.

Brahm Samaj advocated widow remarriage without going through the merits, scientific social reasons behind it.

The British raised a boggy of untouchability. 

The constitution framers in India inserted several clauses in it which are grossly anti Hindu, biased, unmindful, vague, irrelevant counter productive like marriage by a Hindu more than once.

All out efforts are made to divide the Hindu for the sake of political reason, which too will be countered-paid in the same coin in due course of time.

Hinduism does not need revival since its eternal, since ever, for ever.

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥Shrimad Bhagwad Geeta 18.47॥ 

अच्छी प्रकार अनुष्ठान किये हुए-आचरण किए हुए परधर्म-दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना हिन्दु धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य, पाप को नहीं प्राप्त होता। 

Inherent prescribed, Varnashram Dharm, functions, duties, devoid of virtues-excellence, are better than those belonging to others-carried out methodically with perfection, since carrying out of own righteous, natural deeds keeps the doer-performer, free-untainted from sins, vices, wickedness, wretchedness.स्वधर्म वर्णाश्रम धर्म और उपरोक्त वर्णित सम्प्रदाय (यहाँ हिन्दु धर्म) को ही मानें-समझें। अपना धर्म अगर दूसरे से निम्न-निकृष्ट मानेंगे तो ही समस्या होगी ही। अगर आप शूद्र को वैश्य से निकृष्ट समझकर अपने को हीन समझेंगे तो समस्या उत्पन्न होगी ही। अतः अपने धर्म में स्थापित-व्यवस्थित रहें और भगवत् आराधना  करते रहें, शेष मालिक-भगवान् पर छोड़ दें। आपात काल में कोई भी किसी भी वर्ण धर्म का आलम्बन लेकर जीविका अर्जित-उपार्जित कर सकता है; परन्तु हालत सामान्य होते ही, स्वधर्म का आचरण करें। पूर्वजों ने दबाब, लालच, जान जाने के भय से अगर अन्य धर्म को अपना लिया था; तो भी कोई बात नहीं। अगर आज हालत सुधर गए हैं, परिस्थिति अनुकूल है, तो घर वापस आ जाओ। आसुरी शक्तियों, दस्यु समुदाय, बुरे लोगों की संगति को भी त्याग  दो। पापकर्म, अन्याय, स्वार्थ, अभिमान को त्याग दो। डरो मत। अच्छाई का परिणाम अन्ततोगत्वा, अच्छा ही होता है। निहित-विहित कर्म करो, निषिद्ध को त्याग दो। दुर्गुण-दुराचार से बचो। विवेक, सदाचार, सतसंग, शास्त्र का  आलम्बन ग्रहण करो, सब कुछ ठीक हो जायेगा। यह कभी मत भूलो कि तुम मनुष्य हो, समर्थ हो, सबल हो, तुम्हारा जन्म हो मुक्ति  के लिए ही हुआ है। 

Natural duties-professions fixed-decided by birth, constitute the inherent tendencies. It’s better to stick to own-ancestral profession which may be full of difficulties and stress, as compared to that of others which is easy, simple, great or virtuous. Own prescribed duties should be accepted with grace and dignity, while that of others, should be discarded as prohibited and below dignity. However, during emergencies, services, jobs-works done under stress-duress, for survival, may be treated as own, for the time being only. One should revert to his Varnashram duties, as soon as he comes out of distress. Those who were converted through deceit, threat to life, greed have the opportunity to revert back to own-ancestors faith-religion. Work-task-assignment is over as soon as it is carried out, but its impressions remain over the soul.

Each and every one is capable, free and has the right to modify, improve, strengthen himself by divine-virtuous characters and reject the ones which are satanic, demonic, monstrous depending upon need, nature, situation and demand. Certain common functions like simplicity, self control, restraint, soft-polite, pleasing, refined, soothing, affectionate, polished tone, language and behavior; considered to be natural for Brahmns, may be observed by all the four Varn. Individual suffering from inborn demonic experiences, impressions can easily overcome them through prudent, pious, virtuous, company-association, interest (religious gatherings) in holy literature (scriptures) sanctifying-purifying rites, blessed with divine desire.

Human body has been gifted for seeking, approaching, culminating the Supreme Soul. All divine characters are to be observed by all the four Varn as righteous duties and all demonic, monstrous, satanic defects-duties and vices-wickedness, guilt’s, have to be discarded as Adharm (religiosity, impiety).

Righteous-prescribed duties and the ones performed for survival without involvement, devoid of selfishness and ego for the benefit-help of the society-mankind do not taint the doer with sin or guilt.

All unnatural acts are sinful. The individual must not do-commit an act which he forbids for self. The actions associated with selfishness in a fit of revenge, rage, anger with ego-desires deserve to be rejected, since they are the root cause of crime, sin, birth & rebirth.

Different activities by different people in different situations, circumstances, conditions, atmosphere, carried out for attainment of Supreme Power-Permanand are free from sins. One should be alert to maintain natural acts free from defects.

Results of sins are numerous including hell, birth as plant, animal, insect or as a human being in a particular class, caste, creed, more, place, community, belief, religion.

The individual preaching divine characters should be aware of modifying, his own habits, behavior, working, life style, activities for which he is quite capable and eligible. Human body has been gifted to the soul to sanctify-purify. So, every attempt has to be made for progress in the right direction i.e,. the Almighty.

BRAHM VIDYA ब्रह्म विद्या

A faith healer, psychoanalyst, and marriage-love counsellor.

BRAHM VIDYA ब्रह्म विद्या

 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 

By :: Pt. Santosh Bhardwaj

dharmvidya.wordpress.com hindutv.wordpress.com santoshhastrekhashastr.wordpress.com  bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com santoshkipathshala.blogspot.com santoshsuvichar.blogspot.com   santoshkathasagar.blogspot.com   bhartiyshiksha.blogspot.com     santoshhindukosh.blogspot.com 

“तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये”। 

कर्म वह है जो बन्धन पैदा न करे। विद्या वह है जो बन्धन से मुक्त कर दे। 

The scriptures consider a deed to be real, virtuous, auspicious, righteous, austerity which does not create ties, bonds, attachment, hurdles in the path of Salvation for the devotee-practitioner. That knowledge is real education, which cuts bonds, ties, hurdles in the path of Liberation-Assimilation with the Ultimate-the Almighty.

Learning has 32 forms  called Brahm Vidya-the knowledge of the Ultimate to release the soul from rebirth-reincarnation.

(1). सद्विद्या-परब्रह्म अपने सङ्कल्पा नुसार सबके कारण हैं, 

(2). आनन्द विद्या-वे कल्याण गुणाकर वैभव सम्पन्न आनन्दमय हैं, 

(3). अन्तरादित्य विद्या-उनका रूप दिव्य है, 

(4). आकाश विद्या-उपाधिरहित होकर वे सबके प्रकाशक हैं, 

(5). प्राणविद्या-वे चराचर के प्राण हैं, 

(6). गायत्री ज्योतिर्विद्या-वे प्रकाशमान हैं, 

(7). इंद्र प्राणविद्या-वे इन्द्र, प्राण आदि चेतना चेतनों के आत्मा हैं, 

(8). शाण्डिल्य विद्या अग्निरहस्य-प्रत्येक पदार्थ की सत्ता, स्थिति एवं यत्न उनके ही अधीन हैं, 

(9). नचिकेता सविद्या-उनमें समस्त संसार को लीं करने की सामर्थ्य है, 

(10). उप कोसल विद्या-उनकी स्थिति उनके नेत्र में है, 

(11). अन्तर्यामी विद्या-जगत उनका शरीर है, 

(12). अक्षर विद्या-उनके विराट रूप की कल्पना में अग्नि आदि अङ्ग बनकर रहते हैं, 

(13). वैश्वानर विद्या-स्वर्लोक, आदित्य आदि के अङ्गी बने हुए वे वैश्वानर हैं

(14). भूम विद्या-वे अनन्त ऐश्वर्य सम्पन्न हैं, 

(15). गाग्र्यक्षर विद्या-वे नियन्ता हैं, 

(16). प्रणवोपास्य परमपुरुष विद्या-वे मुक्त पुरुषों के योग्य हैं, 

(17). दहर विद्या-वे सबके आधार हैं, 

(18). अंगुष्ठ प्रमित विद्या-वे अन्तर्यामी रूप से सबके हृदय में विद्यमान हैं, 

(19). देवोपास्य ज्योतिर्विद्या-वे सभी देवताओं के उपास्य हैं, 

(20). मधु विद्या-वे वसु, आदित्य, मरुत् और साध्यों के आत्मा के रूप में उपास्य हैं,

(21). संवर्ग विद्या-अधिकारानुसार वे सभी के उपास्य हैं

(22). अजाशरीर विद्या-वे प्रकृति तत्व के नियन्ता हैं

(23). बालाकि विद्या-समस्त जगत् उनका कार्य है,

(24). मैत्रयी विद्या-उनका साक्षात्कार कर लेना मोक्ष का साधन है, 

(25). द्रुहिण रुद्रादि शरीर विद्या-ब्रह्मा, रूद्र आदि-आदि देवताओं के अन्तर्यामी होने के कारण उन-उन देवताओं की उपासना के द्वारा वे प्राप्त होते हैं, 

(26). पंचाग्नि विद्या-संसार के बन्धन से मुक्ति उनके अधीन है, 

(27). आदित्य स्थाहर्नामक विद्या-वे आदित्य मण्डलस्थ हैं, 

(28). अक्षीस्थाहन्नामक विद्या-वे पुण्डरीकाक्ष हैं, 

(29). पुरुष विद्या-वे परम पुरुष, पुरुषोत्तम हैं, 

(30). ईशावास्य विद्या-वे कर्म सहित उपासनात्मक ज्ञान के द्वारा प्राप्त होने वाले हैं, 

(31). उषस्तिकहोल विद्या-भोजनादि विषयक नियम भी उनके प्राप्त करने में अनिवार्य होते हैं और 

(32). व्याहृति शरीरक विद्या-व्याहृतियों की आत्मा बनकर वे मंत्रमय हैं। 

BRAHMAN DHARM ब्राह्मण धर्म

A faith healer, psychoanalyst, and marriage-love counsellor.

BRAHMAN DHARM ब्राह्मण धर्म

 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 

By :: Pt. Santosh Bhardwaj

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It describes the practices, rituals, duties, methods, procedures meant for the Brahmans only, which have been mentioned in the scriptures; not for any one else. Its really very difficult to adopt them. However, one who is determined and devoted to the Almighty may proceed further.

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। 

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥श्रीमद्भागवत गीता 18.42॥ 

अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों को वश में करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर, लोक-परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा, वेद आदि में आस्था रखना, ये सब के सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।  

Equanimity, serenity-self control-restraint, peace loving, tolerance (bearing of pain, difficulty, suffering, inconvenience, hardship, torture, for righteous or devout conduct to carry-out religious faith-duties), purity-austerity and cleansing (internal and external), faith in eternity, forgiveness, honesty, uprightness-simplicity of body and mind, wisdom-knowledge of Ved, Puran, Upnishad, Brahmns are the natural duties-qualities of the Brahmns.

ब्रह्म कर्म, सत्वगुण की प्रधानता, ब्राह्मण के स्वाभाविक गुण-लक्षण हैं। इनमें उसको परिश्रम नहीं करना पड़ता। 

शम: :: मन को जहाँ लगाना हो लग जाये और जहाँ से हटाना हो वहां से हट जाये।

दम: :: इन्द्रियों को वश में रखना।

तप: :: अपने धर्म का पालन करते हुए जो कष्ट आये उसे प्रसन्नतापूर्वक सहन करना।

शौच :: मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर, खान-पान, व्यवहार को पवित्र रखना। सदाचार का पालन। क्षान्ति-बिना क्षमा माँगे ही क्षमा करना। आर्जवन-शरीर, मन, वाणी व्यवहार, छल, कपट, छिपाव, दुर्भाव शून्य हों। ज्ञान-वेद, शास्त्र, इतिहास, पुराण का अध्ययन, बोध, कर्तव्य-अकर्तव्य की समझ। विज्ञान-यज्ञ के विधि-विधान, अवसर, अनुष्ठान का उचित-समयानुसार प्रयोग। आस्तिकता-परमात्मा, वेद, शास्त्र, परलोक आदि में आस्था-विश्वास, सच्ची श्रद्धा और उनके अनुसार ही आचरण। 

आजकल के ब्राह्मण में कलयुग का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है और कुछ को छोड़ कर शेष नाममात्र के ब्राह्मण हैं। केवल ब्राह्मण कुल में जन्म लेने मात्र से ही कोई ब्राह्मण नहीं हो जाता; उसे ब्राह्मण उसके माँ-बाप, गुरु जन, शिक्षा-दीक्षा से बनाया जाता है। 

A Brahmn is deemed to have self control over his senses, organs and the mind in order to fix and channelise the brain and energies as per his own will and desire. It enables him to utilize, divert or restraint his capabilities in best possible manner for the service of mankind, humanity and society.

He is capable of bearing with pain, insult, torture, difficulty, suffering, inconvenience, hardship and wretchedness, while carrying out righteous or devout conduct, duties. He restrains himself, though capable of repelling wickedness and improper conduct.

During the current cosmic era-Kaliyug the Brahmn is the most deprived lot. He has to accept various jobs for his survival in addition to performing his traditional duties, Pooja, Path, Yagy, Hawan, Agni Hotr, study of Veds, scriptures and guiding, motivating the public to seek Moksh.

He has to ascertain purity of body, mind and soul, senses, organs; purity of food, drinks and behavior. Maintenance of good habits of excretion, bathing are essential for him, in daily routine. He should ad hare to pious behavior, virtuous and ethical conduct. He is always soft and polite and uses decent, dignified, distinguished language. He never uses harsh words or language.

Those who migrate to other counties forget all these things and adopt them selves to those circumstances-situations. Still the prudent never forget these and seek guidance from learned, enlightened.

He forgives, without being asked happily, though cable to punish with the strength, power and might possessed by him. He is immune to defamation, back biting and insult.

He bears simple cloths. He is simple, honest and open. He is free from cheating, cunningness,  trickery, fraud, deceit, deceiving, ill will etc.

He studies and learns Ved, Puran, Upnishad, Brahmn, Ramayan, Mahabharat, Geeta and History; acquires the knowledge of various other scriptures to understand, accept and act in accordance with them. He has the understanding and experience of do’s and do not’s of performing Vedic rites, sacrifices and scientific methods.

He has firm faith and belief in God, Ved, other Abodes (life after death, rebirth) and respects and honour them. A Brahmn is not burdened to act in accordance with them, since he is born in such families, where purity of blood has been maintained. He has the natural Brahmanical tendencies (DNA< chromosomes, genes) in him due to the atmosphere, company and association. Importance is not given to the means of livelihood-earning for living due to the presence of Satvik characters, practice, company, self study. It’s for the society to take care of him, since he is the real owner of the earth and all means of livelihood.

A Brahmn has to be an ideal person with high moral character, values, virtues and dignity. He should command respect in the society. He should purify and sanctifies himself every day, in the morning by bathing, prayers and rituals. He is a devotee of God with simple living and high thinking. He learns and acquires the knowledge of various Vedic literature  He himself accepts donations and distributes the surplus, among the ones who are in need of them. He teaches and guides the students and disciples. He is free from ill will, anger, envy and prejudices. He is always soft and polite, with graceful-refined decent tone, language and behavior. He is revered in the society in high esteem and is ready to help anyone and everyone. He is simple and down to earth, in behavior and practice. He observes fast on festivals. He is away from wine, woman, narcotics, drugs, meat, fish and meat products. He adhere to ascetic practices and performs Hawan, Yagy, prayers and religious ceremonies as per calendar, on the prescribed dates auspicious occasions and schedule. He has conquered his desires.

Brahmns have originated from the forehead of Brahma. They are the mouth of the community and the store house of knowledge and wisdom. Teaching, educating, showing the right direction and preaching the four Varn are the pious duties of a Brahmn. Any one who is a Brahmn by birth, but do not possess the Brahmnical qualities, characters, virtues, morals, wisdom is not considered to be a Brahmn. The Brahmns who are corrupt in respect of food, habits, behavior, devoid of Bhakti, devotion to God are considered to be inferior to lower castes.

Any one who insults, misbehaves a Brahmn and invite his wrath, has his abode in the hells. His life is cursed and all sorts of pains, tortures, insults comes to him uninvited.

COMMON CHARACTERICES OF ALL VARNS-CASTES :: (1). दान पुण्य, (2). हवन, अग्नि-होत्र, यज्ञ करना,  (3). धूप बत्ती, अगर बत्ती, लोबान, शुद्ध देशी घी या सरसों के तेल का दीया जलाना, आरती करना-उतारना, पूजा-पाठ करना, (4). तीर्थ स्थलों की यात्रा करना, (5). पवित्र नदियों, तालाबों, झीलों यथा मन सरोवर में नहाना, (6). योग्य, आदरणीय-पूजनीय व्यक्तिओं व देवी-देवताओं का सम्मान, (7). केवल अपनी पति के साथ-केवल ऋतु कल में संतान हेतु मैथुन-गर्भाधान,  (8). सभी प्राणियों पर दया करना, (9). सत्य बोलना, आचरण, (10). अत्यधिक कठिन श्रम न करना, (11). अपने पर निर्भर व्यक्तियों हेतु धन कमाना, (12). सभी से मित्रता पूर्ण व्यवहार, (13). शरीर, मन, आत्मा की शुद्धि, साफ सफाई, (14). इच्छा रहित कार्य-कर्म, समाज भले-हित के लिये कार्य, अनुसंधान,  (15). किसी के कार्य में कमी, गलती, बुराई न देखना-निकालना, (16). कंजूसी न करना इत्यादि। 

(1). Donation-charity, (2). Performing  Hawan, Agni Hotr-Sacrifices in Fire, Yagy, (3). Burning Dhoop, incense sticks, Loban-Banzoin, wick lamps of mustard, Deshi Ghee, Arti, Pooja-Path, (4). Visiting Holi places-pilgrimages, (5). Bathing in Holi rivers, ponds, lakes like Man Sarovar, (6). Honouring the deserving and the deities, (7). Sex-mating-intercourse with own wife only  and that is too during ovulation for the sake of progeny only, (8). Kindness-pity towards all creatures, (9). Truthfulness, (10). avoidance of extreme -too much, painful, excessive labour, (11). earning money for dependent, (12). Friendly behaviour with every one-organism creature, (13). Cleanliness of the body, mind and the soul, (14). Doing of work without desires, performing for the welfare of the society others,  (15). Not to see-find faults with others, (16). Lack of miserliness, etc, 

CHARACTERISTICS OF BRAHMNS ब्राह्मण गुण धर्म :: कुछ अपवादों को छोड़ कर अधिकतर ब्राह्मण अपने स्वाभाविक गुणों के आधार पर पहचाने जाते हैं। (1). शुद्ध सात्विक आचार- व्यवहार, निरामिष  भोजन, सदाचार। (2). अत्यधिक विकसित मस्तिष्क, मानसिक शक्ति।(3). वेदों, पुराणों, शास्त्रों, रामायण, महाभारत इतिहास आदि का पढ़ना और पढ़ाना। (4). साहस, पौरुष।(5). मजबूत शरीर व माँस पेशियाँ-बाहुबल। (6). पढ़ना-पढाना, स्वाद्ध्याय, चिंतन भक्ति। (7). गौर वर्ण।(8). माँस, मच्छी, अंडा, माँसाहार न करना। (9). धुम्रपान, बीडी-सिग्रेट न पीना; नशाखोरी, शराब से दूर रहना।(10). अपनी पत्नी के अलावा अन्य स्त्री के बारे में न सोचना। (11). किसी को भी न सताना, परेशान तंग न करना, हानि न पँहुचाना। (12). सहन शक्ति, क्रोध न करना-काबु रखना। (13). दैनिक स्नान पूजा पाठ प्रार्थना।(14). भगवान देवी देवताओं पूर्वजों को भेंट चढ़ाना। (15). शुद्ध सात्विक साधनों द्वारा धन कमाना। (16). अपनी आवश्कताओं को न्यूनतम स्तर पर सीमित   रखना। (16). संग्रह की  पृव्रति  का अभाव। (17). समाज के उत्थान-विकास का प्रयास। (18). सभी प्राणियों से सामंजस्य बनाये रखना। (19). धन, जवाहरात, गहनों व पत्थरों को समान समझना (20). अपनी पत्नी के अलावा अन्य स्त्री से गर्भाधान न करना, वह भी केवल ऋतू काल में, केवल  रात्रि में, राहु-कालम व ग्रहण में कतई नहीं। 

परम्परा के अनुसार ब्राह्मण वैद्य, चिकित्सक, ज्योतिषी, हस्त रेखा परीक्षक, मन्दिर के पुजारी और यज्ञ कर्ता, सेना के सचालक, राजा के परामर्शदाता, न्यायाधीश होते थे। यदि किसी स्त्री का पति असमर्थ होता था तो संतानोत्पत्ति में उसके परिवार की सहमति से संतानोत्पत्ति यज्ञ की संसाधना भी करते थे। 64 विद्याओं, विधाओं का ज्ञान प्रदान करना, ऋषिकुल की स्थपना-विश्वविद्यालय और संचालन। समस्त ऋषियों का नाम वैज्ञानिक के रूप में भी पाया जाता है। 

ईर्षालु आलोचक, मूर्ख, अविवेकी, नासमझ, अनपढ़, विधर्मी, इसे धर्म का नाम देते यद्यपि इस तरह की किसी चीज का शास्त्रों में कहीं भी कोई भी वर्णन नहीं है। यह मात्र भ्राति के अलावा कुछ भी नहीं है। कोई भी योग्य, काबिल, विवेकी व्यक्ति ब्राह्मण बन सकता है यदि उसमें क्षमता है। 

Barring a few exceptions majority of Brahmns are blessed with certain characteristics which differentiate them with the other Varns. (1). Pure vegetarian food descent behavior. (2). Highly developed brain power, Study  and teaching of Veds, (3). Purans, epics, scriptures, (4). Courage, valour, bravery, (5). Stout body and muscle power, (6). Learning, educating, meditation, prayers, Bhakti worship-devotion to God, (7). fair colour-complexion, (8). Non consumption of meat, meat products, fish, eggs, (9). Non consumption of narcotics, drugs, wine, (10). Not to think of other women, (11). Not to harm or trouble any one, (12). Tolerance-not to become angry, (13). Regular bathing, performance of rights-rituals-prayers, (14). making offerings to God-deities-ancestors, (15). Earning money through honest-righteous pure means, (16). To keep own needs to the barest possible minimum, (17). Tendency not to store-accumulate for future,  (18). Should be devoted to for the development, growth, upliftment of society, (19). Harmonious relations-cordial relations with all creatures, (20). Weighs stones, gems and jewels equally, (21). Inclination towards sex with own wife only and that is too, during the ovulation period, during night only, avoidance of Rahu Kalam and eclipse. 

Traditionally the Brahmns used to be physicians-doctors (Vaedy), astrologers, Palmists, teachers, ministers, king’s adviser, judges. State administrations and army management were their primary duties. They helped women whose husbands were functionally impotent, with the consent of their family. Providing education in 64 faculties. Establishment of universities and maintenance. 

Duties assigned to Brahmns :: Acquiring knowledge-learning and training for self, educating others, performing Yagy-sacrifices, accepting and making donations-charity, piousness-purity, performing natural deeds, Satvik food habits. All of his movements should be directed towards the service of the four Varn and the mankind, in whom the Almighty is pervaded. He has to perform all his duties happily, with pleasure and devotion to God as per his dictates, with wisdom.

Inherent activities of Brahmns are placid and mild, as compared to that of Kshatriy, Vaeshy or Shudr. Still, the Kshatriy, Vaeshy and Shudr remain free from defects. On the contrary, they are benefited by observing them, since they are according to their nature, prescribed and easy to do and in line with scriptures. Even the mandatory sins associated with violence, do not affect them.

Please refer to :: EDUCATION IN ANCIENT INDIA प्राचीन भारतीय शिक्षा  bhartiyshiksha.blogspot.com  

Some ignorant critics, envious, incapable, imprudent, idiots call it Brahmn Dharm, though nothing like exists in the scriptures. Its purely a deceptive notion. However, anyone is free to become a Brahmn if he has calibre, capability, capacity.

BRAHMANS TODAY वर्तमान में ब्राह्मण :: It’s very-very difficult, rather impossible to follow-observe the self imposed restrictions, prohibitions, dictates in the life of a Brahmn. It’s clearly the reason behind the evolution of the tree of Varn, caste-creed in Hindu religion-society.

One is free to become a Brahmn just by following the long-long list of do’s and don’ts.

Daksh Prajapati, who was born out of the right foot-toe of Brahma Ji, may be treated as a Shudr (born out of the feet of Brahma Ji).

His 13 daughters, who were married to Kashyap-a Brahmn,  followed the dictates of Shashtr; gave birth to all life forms on including Shudr, Mallechhe (Christians & Muslims) earth.

Sanctity, righteousness, asceticism, virtuousness, religiosity, truthfulness, purity, piousity, poverty, donations, charity, kindness, fasting, contentedness, satisfaction, teaching and learning Veds, Purans, Epics, Shashtr, harmony, peace, soft spokenness, decent behavior, tolerance, highly developed fertile creative brain, excellent memory-power to retention-grasp, not to envy, anger, greedy, perturbed, tease are synonyms to a Brahmn. 

Today’s Brahmns are Brahmns only for the name sake. They are just the carriers of the genes, chromosomes, DNA of their ancestors, Rishis, fore fathers. They are changing with the changing times and do not hesitate-mind, adopting any profession, trade, business, job for the sake of earning money for survival, in the ever increasing race of fierce competition-in a world, which is narrowing down-shrinking, day by day, in an atmosphere of scientific advancement, discoveries, innovations, researches. However, which ever is the field, they work-choose, they assert their excellence-highly developed mental calibre, capabilities, capacities and move ahead of others, facing-tiding over, all turbulence, difficulties, resistances.

BRAHMANICAL VIRTUES ब्राह्मण संस्कार :: 

ब्राह्मण के तीन जन्म  होते हैं :- (1). माता के गर्भ से, (2). यज्ञोपवीत से व (3). यज्ञ की दीक्षा लेने  से। यज्ञोपवीत के समय गायत्री माता व और आचार्य पिता होते हैं। वेद की शिक्षा देने से आचार्य  पिता कहलाता है। यज्ञोपवीत के बिना, वह किसी भी वैदिक कार्य का अधिकारी नहीं होता। जब तक वेदारम्भ न हो, वह शूद्र के समान है।     

जिस ब्राह्मण के 48 संस्कार विधि पूर्वक हुए हों, वही ब्रह्म लोक व ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। इनके बिना वह शूद्र के समान है। 

गर्वाधन, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्न प्राशन, चूडाकर्म, उपनयन, चार प्रकार के वेदव्रत, वेदस्नान, विवाह, पञ्च महायज्ञ (जिनसे पितरों, देवताओं, मनुष्यों, भूत और ब्रह्म की तृप्ति होती है), सप्तपाक यज्ञ-संस्था-अष्टकाद्वय, पार्वण, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री, शूलगव, आश्र्वयुजी, सप्तहविर्यज्ञ-संस्था-अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास, चातुर्मास्य, निरूढ-पशुबंध, सौत्रामणि, सप्त्सोम-संस्था-अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम। ये चालीस ब्राह्मण के संस्कार हैं। 

इनके साथ ब्राह्मण में  8 आत्म गुण भी होने चाहियें :- 

अनसूया :: दूसरों के गुणों में दोष बुद्धि न रखना, गुणी  के गुणों को न छुपाना, अपने गुणों को प्रकट न करना, दुसरे के दोषों को देखकर प्रसन्न न होना। 

दया :: अपने-पराये, मित्र-शत्रु में अपने समान व्यवहार करना और दूसरों का  दुःख दूर करने की इच्छा रखना। 

क्षमा :: मन, वचन या शरीर से दुःख पहुँचाने वाले पर क्रोध न करना व वैर न करना। 

अनायास :: जिन शुभ कर्मों को करने से शरीर को कष्ट होता हो, उस कर्म को हठात् न करना। 

मंगल :: नित्य अच्छे कर्मों को करना और बुरे कर्मों को न करना। 

अकार्पन्य :: मेहनत, कष्ट व न्यायोपार्जित धन से, उदारता पूर्वक थोडा-बहुत नित्य दान करना।  

शौच :: अभक्ष्य वस्तु का भक्षण न करना, निन्दित पुरुषों का संग न करना और सदाचार में स्थित रहना। 

अस्पृहा :: ईश्वर की कृपा से थोड़ी-बहुत संपत्ति से भी संतुष्ट रहना और दूसरे के धन की, किंचित मात्र भी इच्छा न रखना। 

जिसकी गर्भ-शुद्धि हो, सब संस्कार विधिवत् संपन्न हुए हों और वर्णाश्रम धर्म का पालन करता हो, तो उसे अवश्य मुक्ति प्राप्त होती है । 

BRAHMAN AS A DISCIPLE :: The student-Brahmchari will begin-receiving lessons-instructions only after the sacred thread is granted to him-Janeu (जनेऊ, loin cord, thread) ceremony. It’s essential to accept the sacred knowledge of the Veds. He is asked to wear a chain, garland, string of beads, skin, stick, cloths, sacred thread, recommended for the purpose of education. He has to follow orders, directives, dictates, sermons, rules-regulations, rituals, practices of his teacher, educator, Guru and remain  as an ascetic, like a hermit. He has to become fresh every day by taking bath  and offering tributes to the deities, ancestors, saints. He has to collect flowers, fruits, water,  naturally dried wood, Kush-a grass with sharp edges, cow dung, pure clay, mud, earth and different type of of wood for making hut etc. He should not accept wine, meat, fish, egg, meat products, scents, flower garland-beads, various juices-extracts and reject the company of the women. Violence of any kind, speaking-telling lies, blame, censure, scorn, abuse, defamation, slander, criticism, blasphemy, betting, company of women, sensuality, passions, sexual acts, greed, anger-envy are not allowed-have to be skipped. He has to remain alone-in solitude with control over himself and all of his faculties.

Begging, only as per need  with self restraint, control over speech-tongue-utterances, from such families only, who have faith in God, Veds, Hawan, Agnihotr, is allowed. In case alums from such families are not available, he may go to the relative of his Guru, own relatives, acquaintances. He should ensure that the alums are not collected from  the same-one family every day, unless-until their is an emergency. Grain collected through begging should constitute  his main food. Dependence over begging for survival is like fasting. One should not beg before-in front of, from  the sinners, wretched, wicked people. Scriptures-Shashtr do not consider this type of collection of alums as begging.

Hawan has to be performed every day by collecting dried wood and sacrifices in the fire are made. 

The disciple should stand before the Guru with folded hands and sit  over the ground only when he is asked to sit and that is too without the mat, cushion, seat in high esteem. He should wake up before the Guru and sleep only when the Guru has slept. He should not speak the name of the Guru and never mimic copy him. He should never criticise the teacher and speak slur against him. He should close his ears if some one is criticising him and moves away from that place. He should  always remain away-aloof from the company of such people-critics.

The disciple, student, child should come down-out of the vehicle to pay regards-respect to elders, Guru, high and mighty. He should behave with the relatives of the Guru in a manner, similar to that he practices with the Guru. Wife of the Guru should be treated as the Guru himself, but touching her in any manner is prohibited. Never sit on the same cushion, seat, mat, bed, with sister, mother, daughter and the wife of the Guru, teacher, educator, master, revered, respected person

He should move-come out  of the village before dawn and dusk. Morning and evening prayers, offerings, recitations have to be performed near a water source-body. Mother, father, parents-guardians, elders and brothers must be regarded and should not be betrayed during trouble-difficult times-periods.

Regular service of the parents-Guru ensures education, enlightenment, knowledge. He should not follow any other practices-service unless until ordered by them. He has to adhere to his own Dharm.

ब्राह्मण छात्र धर्म :: यज्ञोपवीत संपन्न हो जाने पर वटुक (विद्यार्थी) को व्रत का उपदेश ग्रहण करना चाहिये और वेदाध्ययन करना चाहिये। यज्ञोपवीत के समय जो मेखला, चर्म, दंड, वस्त्र, यज्ञोपवीत आदि धारण करने को कहा गया है, उन्हीं को धारण करे। अपनी तपस्या हेतु ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय होकर गुरु की सेवा में तत्पर रहे व नियमों का पालन करे। नित्य स्नान करके देवता, पितर और ऋषिओं का तर्पण करे। पुष्प, फल, जल, समिधा, मृतिका, कुश, और अनेक प्रकार के काष्ठों का संग्रह करे। मद्य, मांस, गंध,पुष्प माला, अनेक प्रकार के रस और स्त्रियों का परित्याग करे। प्राणियों की हिंसा, शरीर में उबटन लगाना, अंजन लगाना, जूता व छत्र धारण करना, गीत सुनना, नाच देखना, जुआ खेलना, झूंठ बोलना, निंदा करना, स्त्रियों के समीप बैठना,  काम-क्रोध-लोभादि के वशीभूत होना-इत्यादि ब्रह्मचारी के लिए वर्जित है-निषिद्ध हैं। उसे संयम पूर्वक एकाकी रहना है। उसे जल, पुष्प, गाय का  गोबर,  मृतिका और कुशा का संग्रह करे। 

आवश्कतानुसार भिक्षा नित्य लानी है। भिक्षा माँगते वक्त वाणी पर संयम रखे। जो ग्रहस्थी अपने कर्मों (वर्णाश्रम धर्म) में तत्पर हो, वेदादि का अध्ययन करे, यज्ञादि में श्रद्धावान हो उसके यहाँ से ही भिक्षा ग्रहण करे। इस प्रकार भिक्षा न मिलने पर ही, गुरु के कुल में व अपने बंधु-बांधव, पारिवारिक सदस्य-स्वजनों से भिक्षा प्राप्त करे। कभी भी एक ही परिवार से भिक्षा ग्रहण न करे। भिक्षान्न को मुख्य अन्न माने। भिक्षावृति से रहना, उपवास के बराबर माना गया है। महापातकियों से भिक्षा कभी स्वीकार न करे। इस प्रकार की भिक्षा को शास्त्र में भीख नहीं माना गया है। 

नित्य समिधा लाकर प्रतिदिन सायं काल व प्रात: काल हवन करे। 

ब्रह्मचारी गुरु के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा हो गुरु की आज्ञा से ही बैठे, परन्तु आसन पर नहीं। गुरु के उठने से पूर्व उठे व सोने के बाद सोये, गुरु के समक्ष बड़ी विनम्रता से बैठे, गुरु का नाम न ले, गुरु की नक़ल न करे। गुरु की निंदा-आलोचना न करे, जहाँ  गुरु की निंदा-आलोचना  होती हो वहाँ से उठ जाये अथवा कान बंद कर ले।  गुरु निंदक-आलोचकों से  सदा दूर ही रहे। 

वाहन से उतर कर  गुरु को अभिवादन-प्रणाम करे। वह एक ही वाहन, शिला, नौका आदि पर गुरु के बैठ सकता है। गुरु के गुरु, श्रेष्ठ सम्बन्धी, गुरु पुत्र के साथ गुरु के समान ही व्यवहार करे। गुरु की सवर्णा स्त्री को गुरु के समान ही समझे, परन्तु पैर दवाना, उबटन लगाना, स्नान कराना निषिद्ध हैं। बहन, बेटी, माता के साथ  कभी भी एक ही आसन पर न बैठे। 

गाँव में सूर्योदय व सूर्यास्त न होने दे-जल के निकट-निर्जन स्थान पर दोनों संध्याओं में संध्या-वंदन करे।  

माता, पिता, आचार्य व भाई का विपत्ति में भी अनादर न करे, सदा आदर करे। 

माता, पिता,आचार्य की नित्य सेवा-शुश्रूषा करने से ही विद्या मिल जाती है। इनकी आज्ञा से ही किसी अन्य धर्म का आचरण करे अन्यथा नहीं।  

RELATED CHAPTERS :: 

(1). BRAHMAN VANSH ब्राह्मण वंश परम्परा bhartiyshiksha.blogspot.com

(2). BHARDWAJ CLAN भरद्वाज वंश  bhartiyshiksha.blogspot.com

(3). HINDU PHILOSOPHY (1 to 11) हिंदु दर्शन  bhartiyshiksha.blogspot.com 

HINDI ALPHABETS

 

अनार 

 ANAR

anar 

 

POMEGRANATE 

pomegranate 

पॉमग्रेनेट

   

आम

AAM

aam 

 

 

MANGO

Mango

 मैंगो

 

   

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

*AYUR VED CHAPTER (11) :: CHARAK SANHITA चरक संहिता 

A faith healer, psychoanalyst, and marriage-love counsellor.

AYUR VED CHAPTER (11) :: CHARAK SANHITA चरक संहिता 

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 

By :: Pt. Santosh Bhardwaj

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जगत के पालन हार भगवान् विष्णु समुन्द्र मन्थन के परिणाम स्वरूप हाथ में अमृत कलश लेकर धन्वन्तरि के रूप में प्रकट हुए। उन्हें आयुर्वेद का मूल-प्रतिपादक माना जाता है। पुराणों में आयुर्वेद का विस्तृत वर्णन है। इस चिकित्सा पध्यति के अनेकानेक विद्वानों में चरक, शुश्रुत प्रमुख हैं। 

Photoचरक वे चिकित्‍सक थे, जिन्‍होंने पाचन, चयापचय और शरीर प्रतिरक्षा की अवधारणा दुनिया के सामने रखी। चरक का यह मानना था कि चिकित्‍सक अपने ज्ञान और समझ का दीप लेकर पहले रोगी के शरीर और मन स्थिति को समझे। उसे उन सब कारणों का अध्‍ययन करना चाहिए, जो कि रोगी को प्रभावित करते हैं। तत्‍पश्‍चात उसका उपचार किया जाना चाहिए।

उन्‍होंने बताया कि शरीर के कार्य के कारण उसमें तीन स्‍थायी दोष पाए जाते हैं, जिन्‍हें पित्‍त, कफ और वायु के नाम से जाना जाता है। ये तीनों दोष शरीर में जब तक संतुलित अवस्‍था में रहते हैं, व्‍यक्ति स्‍वस्‍थ रहता है। लेकिन जैसे ही इनका संतुलन बिगड़ जाता है, व्‍यक्ति बीमार हो जाता है। इसलिए शरीर को स्‍वस्‍थ करने के लिए इस असंतुलन को पहचानना और उसे फिर से पूर्व की अवस्‍था में लाना आवश्‍यक होता है।

भारतवर्ष ही नहीं बल्कि सम्‍पूर्ण विश्‍व में चरक एक महर्षि एवं आयुर्वेद विशारद के रूप में जाने जाते हैं। उन्‍होंने आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्‍थ ‘चरक संहिता’ का सम्‍पादन किया। चरक संहिता आयुर्वेद का प्राचीनतम ग्रन्‍थ है, जिसमें रोगनिरोधक एवं रोगनाशक दवाओं का उल्लेख है। इसके साथ ही साथ इसमें सोना, चाँदी, लोहा, पारा आदि धातुओं से निर्मित भस्मों एवं उनके उपयोग की विधि बताई गयी है। कुछ लोग भ्रमवश आचार्य चरक को ‘चरक संहिता’ का रचनाकार बताते हैं, पर हकीकत यह है कि उन्‍होंने आचार्य अग्निवेश द्वारा रचित ‘अग्निवेश तन्त्र’ का सम्‍पादन करने के पश्‍चात उसमें कुछ स्थान तथा अध्याय जोड्कर उसे नया रूप प्रदान किया। ‘अग्निवेश तंत्र’ का यह संशोधित एवं परिवर्धित संस्‍करण ही बाद में ‘चरक संहिता’ के नाम से जाना गया।

भारतीय संस्‍कृति में ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता माना गया है। कहा जाता है कि ब्रह्मा ने मनुष्‍यों को पैदा किया। जब मनुष्‍य पैदा हुए, तो उनके साथ भाँति-भाँति के रोग भी उत्‍पन्‍न हुए। उन रोगों से निपटने के लिए ब्रह्मा ने आयुर्वेद का ज्ञान सर्वप्रथम प्रजापित को दिया। प्रजापति से यह ज्ञान अश्विनीकुमारों के पास पहुँचा। वैदिक साहित्‍य में अश्विनी कुमारों के चमत्‍कारिक उपचार की अनेक कथाएँ पढ़ने को मिलती हैं। अश्विनीकुमारों की विद्या से अभिभूत होकर देवराज इन्‍द्र ने आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्‍त किया।

‘चरक संहिता’ के अनुसार एक बार धरती पर अनेक महामारियों का प्रकोप हुआ। इससे चिंतित होकर तमाम ऋषियों ने हिमालय की तराई में एक बैठक बुलाई। इस बैठक में असित, अगस्त्य, अंगिरा, आस्वराथ्य, आश्वलायन, आत्रेय, कश्यप, कपिंजल, कुशिक, कंकायण, कैकशेय, जमदाग्नि, वसिष्ठ, भृगु, आत्रेय, गौतम, सांख्य, पुलत्स्य, नारद, वामदेव, मार्कण्डेय, पारीक्षी, भारद्वाज, मैत्रेय, विश्वामित्र, भार्गव च्वयन अभिजित, गार्ग्य, शाण्डिल्य, कौन्दिन्य, वार्क्षी, देवल, मैम्तायानी, वैखानसगण, गालव, वैजवापी, बादरायण, बडिश, शरलोमा, काप्य, कात्यायन, धौम्य, मारीचि, काश्यप, शर्कराक्ष, हिरण्याक्ष, लौगाक्षी, पैन्गी, शौनक, शाकुनेय, संक्रित्य एवं वालखिल्यगण आदि ऋषियों ने भाग लिया। बैठक में सर्वसम्‍मति से भारद्वाज को अगुआ चुना गया और बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए उन्‍हें इन्‍द्र के पास भेजा गया। इन्‍द्र ने आयुर्वेद का समस्‍त ज्ञान ऋषि भारद्वाज को दिया। बाद में भारद्वाज ने अपने शिष्‍य आत्रेय-पुनर्वसु को इस महत्‍वपूर्ण ज्ञान से परिचित कराया।

आत्रेय-पुनर्वसु के छ: शिष्‍य थे-अग्निवेश, भेल, जतूकर्ण, पराशर, हारीत और क्षारपाणि। बाद में इन शिष्‍यों ने अपनी-अपनी प्रतिभानुसार आयुर्वेद ग्रन्‍थों की रचना की। इनमें से ज्‍यादातर ने आत्रेय के ज्ञान को ही संग्रहीत किया और उनमें थोड़ा-बहुत परिमार्जन किया। आत्रेय के इन तमाम शिष्‍यों में अग्निवेश विशेष प्रतिभाशाली थे। उनके द्वारा संग्रहीत ग्रन्‍थ ही कालांतर में ‘चरक संहिता’ के नाम से जाना गया। चूँकि चरक संहिता के रचनाकार अग्निवेश थे, इसलिए उसे ‘अग्निवेश संहिता’ के नाम से भी जाना जाता है।

चरक संहिता का संगठन: चरक संहिता की रचना संस्‍कृत भाषा में हुई है। यह गद्य और पद्य में लिखी गयी है। इसे आठ स्‍थानों (-भागों) और 120 अध्‍यायों में विभाजित किया गया है। चरक संहिता के आठ स्‍थान निम्‍नानुसार हैं :-(1). सूत्रस्‍थान: इस भाग में औषधि विज्ञान, आहार, पथ्‍यापथ्‍य, विशेष रोग और शारीरिक तथा मानसिक रोगों की चिकित्‍सा का वर्णन किया गया है।(2). निदानस्‍थान: आयुर्वेद पद्धति में रोगों का कारण पता करने की प्रक्रिया को निदान कहा जाता है। इस खण्‍ड में प्रमुख रोगों एवं उनके उपचार की जानकारी प्रदान की गयी है।(3). विमानस्‍थान: इस अध्‍याय में भोजन एवं शरीर के सम्‍बंध को दर्शाया गया है तथा स्‍वास्‍थ्‍यवर्द्धक भोजन के बारे में जानकारी प्रदान की गयी है।(4). शरीरस्‍थान: इस खण्‍ड में मानव शरीर की रचना का विस्‍तार से परिचय दिया गया है। गर्भ में बालक के जन्‍म लेने तथा उसके विकास की प्रक्रिया को भी इस खण्‍ड में वर्णित किया गया है। (5). इंद्रियस्‍थान: यह खण्‍ड मूल रूप में रोगों की प्रकृति एवं उसके उपचार पर केन्द्रित है। (6). चिकित्‍सास्‍थान: इस प्रकरण में कुछ महत्‍वपूर्ण रोगों का वर्णन है। उन रोगों की पहचान कैसे की जाए तथा उनके उपचार की महत्‍वपूर्ण विधियाँ कौन सी हैं, इसकी जानकारी भी प्रदान की गयी है।(7 व 8). साधारण बीमारियाँ: ये अपेक्षाकृत छोटे अध्‍याय हैं, जिनमें साधारण बीमारियों के बारे में बताया गया है।

आनुवंशिकी (जेनेटिक्‍स): बच्‍चों में आनुवांशिक दोष जैसे अंधापन, लंगड़ापन, शारीरिक विकृति आदि उनके माता-पिता के किसी अभाव के कारण नहीं, बल्कि उनके शुक्राणु और अण्‍डाणु के कारण होते हैं।

मनुष्‍य के शरीर में दाँतों सहित कुल हड्डियों की संख्‍या 360 बताई है। हृदय को शरीर का नियंत्रण केन्‍द्र माना है। हृदय शरीर से 13 मुख्‍य धमनियों द्वारा जुड़ा रहता है। शरीर में इसके अतिरिक्‍त भी सैकड़ों छोटी-बड़ी धमनियाँ होती हैं, जो ऊतकों तक भोजन का रस पहुँचाती हैं तथा मल व व्‍यर्थ पदार्थों को शरीर के बाहर निकालने का कार्य करती हैं।

Brahma Ji evolved the science of medicine-surgery with the process of evolution. Very comprehensive and detailed knowledge pertaining to human body, child formation, growth, development, diseases and cure has been illustrated in Purans. Use of herbs for longevity has been described at length. Chapters on Ayurved of these blogs contain useful knowledge. It has now spread all over the world. No scientific studies are available either in support or to disapprove it. How ever it is still in use in India almost in every nook and corner. A number of Allopathic medicines are observed to have the basic components of Ayurvedic medicines.

Charak is a term for a wandering recluse-ascetic. 

The extant text has eight Sthan (sections), totalling 120 chapters. These sections are:

Sutr (General principals): 30 chapters deal with Healthy living, collection of drugs and their uses, remedies, diet and duties of a physician.

Nidan (Pathology): 8 chapters discuss the pathology-determination of eight chief diseases.

Viman (Specific determination): 8 chapters contain pathology, various tools of diagnostics & medical studies and conduct.

Sharir (Anatomy): 8 chapters describe embryology & anatomy of a human body.

Indriy (Sensorial prognosis): 12 chapters elaborate on diagnosis & prognosis of disease on the basis of senses.

Chikitsa (Therapeutics): 30 chapters deal with special therapy.

Kalp (Pharmaceutics and toxicology): 12 chapters describe usage and preparation of medicine.

Siddhi (Success in treatment): 12 chapters describe general principles of Panch Karm.

Seventeen chapters of Chikitsa  Sthan, complete Kalp Sthan and Siddhi Sthan were added later.The text starts with Sutr Sthan which deals with fundamentals and basic principles of Ayurved practice. 

Unique scientific contributions credited to the Charak Sanhita include:

(1). A rational approach to the causation and cure of disease, 920. introduction of objective methods of clinical examination

Direct observation is the most remarkable feature of Ayur Ved (आयुर्वेद), though at times it is mixed up with metaphysics. The Sanhita emphasises that of all types of evidence the most dependable ones are those that are directly observed by the eyes.

Successful medical treatment crucially depends on four factors: (1). The physician, (2). Substances (drugs or diets), (3). Nurse and (4). Patient. 

The qualifications of physician are: clear grasp of the theoretical content of the science, a wide range of experience, practical skill and cleanliness; qualities of drugs or substances: abundance, applicability, multiple use and richness in efficacy; 

Qualifications of the nursing attendant are: knowledge of nursing techniques, practical skill, attachment for the patient and cleanliness.

Essential qualifications of the patients are: good memory, obedience to the instructions of the doctors, courage and ability to describe the symptoms.

Charak (Vol I, Section xv) states: “These men should be, of good character & behaviour, distinguished for purity, possessed of cleverness and skill, imbued with kindness, skilled in every service a patient may require, competent to cook food, skilled in bathing and washing the patient, rubbing and massaging the limbs, lifting and assisting him to walk about, well skilled in making and cleansing of beds, readying the patient and skilful in waiting upon one that is ailing and never unwilling to do anything that may be ordered.”

Charak Sanhita dedicates Chapters 5, 6, 25, 26 and 27 to Ahar Tattv (dietetics-food), stating that wholesome diet is essential for good health and to prevent diseases, while unwholesome food is an important cause of diseases. It suggests that foods are source of heat, nutritive value as well as physiological substances that act like drugs inside human body. Furthermore, along with medicine, Charak Sanhita in Chapters 26 and 27, states that proper nutrition is essential for expedient recovery from sickness or surgery.

Ayurved has been described as the science of eight components-organs (aṣhṭang अष्टांग). 

Kaya Chikitsa (General medicine): Cure of diseases affecting the body.

Kaumar-Bharty and Bal Rog: Treatment of children.

Shaly Tantr: Surgical techniques.

Salaky-Tantr (Ophthalmology): Cure of diseases of the teeth, eye, nose or ear etc.

Bhut-Vidya: It deals with the causes, which are directly not visible and not explained directly from tri-dosh (Pitt, Cough and Vayu), pertaining to micro-organisms or spirits-ghosts.

Agad-Tantr: Gad means Poison, doctrine of antidotes.

Rasayan-Tantr (Geriatrics, Anti Ageings): Doctrine of Rasayan, Rejuvenation.

Vajikaran Tantra (Aphrodisiacs): Deals with healthy and desired progeny.

Ayurved has taken the approach of enumerating bodily substances in the framework of the five classical elements Panch Tattv, Panch Maha Bhoot  viz. earth, water, fire, air and ether. Moreover, Ayurveda name seven basic tissues (dhatu). They are plasma (ras), blood (rakt), muscles (mams), fat (meda), bone (asthi), marrow (majja), and semen (shukr, veery).

Panch Maha Bhoot: Ayurveda states that a balance of the three elemental substances, the Dosh, equals health, while imbalance equals disease. There are three dosh: Vat, Pitt and Kaph. One Ayurvedic theory states that each human possesses a unique combination of these dosh-defects-imbalances which define this person’s temperament and characteristics. Each person has a natural state, or natural combination of these three elements and should seek balance by modulating their behavior or environment. In this way they can increase or decrease the dosh they lack or have an abundance of them respectively. Another view present in the ancient literature states that dosh equality is identical to health, and that persons with imbalance of dosh are proportionately unhealthy, because they are not in their natural state of balance. Prakrati is one of the most important concepts in Ayurved.

Dosh: There are 20 qualities or characteristics (gun, गुण), which are inherent in all substances. They can be arranged in ten pairs of antonyms: heavy-light, cold-hot, unctuous-dry, dull-sharp, stable-mobile, soft-hard, non slimy-slimy, smooth-coarse, minute-gross, viscous-liquid.

Gun: Ensuring the proper functions of channels (shrot, source) that transport fluids is one part of Ayurvedic treatment, because a lack of healthy channels is thought to cause diseases. Practitioners treat patients with massages using oils and Swedan (fomentation) to open up these channels.

Diagnosis: Ayurved has 8 ways of diagnosis. They are Nadi (Pulse, नाड़ी), Mootr (Urine, मूत्र), Mal (Stool, मल), Jivha  (Tongue, जिव्हा), Shabd (Speech, शब्द), Sparsh (Touch, स्पर्श), Druk (Vision, द्रक), Akrati (Appearance, आकृति).

Treatment procedures: Ayurvedic practitioners approach diagnosis by using the five senses.Hearing is used to observe the condition of breathing and speech. The study of the lethal points or marm, (मर्म ) is of special importance.

Head massage is used to apply oils.

TREATMENT & HEALTH PROTECTION :: 

While two of the eight branches of classical Ayurveda deal with surgery (Shaly Chikitsa-Surgery, Salaky -Tantr), contemporary Ayurvedic theory tends to emphasise that building a healthy metabolic system, attaining good digestion and proper excretion lead to vitality. Ayurved also focuses on exercise, Yog, and meditation. To maintain health, a Satvic diet can be prescribed to the patient.

Concepts of Dincharya (Daily Routine, दिनचर्या)  are followed in Ayurved. It emphasises the importance of natural cycles (-waking, sleeping, working, meditation etc.) for a healthy living. Hygiene, too, is a central practice of Ayurvedic medicine. Hygienic living involves regular bathing, cleansing of teeth, skin care, and eye washing.

Ayurved stresses the use of plant-based medicines and treatments. Plant-based medicines are derived from roots, leaves, fruits, barks and seeds such as cardamom and cinnamon. Some animal products like milk, bones, and gallstones, may be used. In addition, fats are used both for consumption and for external use. Minerals, including sulphur, arsenic, lead, copper sulphate, gold, silver etc. are also consumed as prescribed.This practice of adding minerals to herbal medicine is known as Ras Shastr (रस शास्त्र, रसायन). 

A variety of alcoholic beverages known as Mady (मद्य, अर्क, आसव, काढ़ा) are used in Ayurved. It enhances Pitt dosh and mitigates Vat and Kaph dosh. They are grouped by the raw material and fermentation process and classified as: sugar based, fruit based, cereal based, cereal base with herbs, fermentation of vinegar and tonic wines. Mady are used for various purposes including to cause purgation, improve digestion and taste, to create dryness and to produce looseness of joints. Ayurved texts describe it as non-viscid, quick in action, enters into minute pores of the body and cleaning them, spreads quickly.

Purified opium the dried latex from the plant capsule is used in eight Ayurvedic preparation.It balances Vat and Kaph Dosh and enhance Pitt Dosh. Used for treatment of certain conditions of diarrhea and dysentery and also to increase the sexual and muscular powers and produce stupefaction of brain. But, sedative and pain-relieving properties of opium on the human organ was not considered for Ayurvedic treatment purposes. The use of Opium is not found in the ancient Ayurved texts. The therapeutic usage of opium is first mentioned in Sarngadhar Sanhita, as an ingredient of aphrodisiac to delay seminal ejaculation.

Bhaisajya Ratnavali, suggests the use of opium along with camphor for the treatment of acute Gastro-enteritis. In this drug, the respiratory depressant action of Opium was counteracted by the respiratory stimulant property of Camphor. Later books have included the narcotic property for use as analgesic pain reliever.

Cannabis Indica, a plant of Indian origin is use as medicine is first mentioned in Sarngadhara Sanhita, for the treatment of diarrhea. Bhaisajya Ratnavali it has been described as an aphrodisiac.

Both oil and tar were used to stop bleeding. Traumatic bleeding was said to be stopped by four different methods: ligation of the blood vessel; cauterisation by heat; using different herbal or animal preparations locally which could facilitate clotting; and different medical preparations which could constrict the bleeding or oozing vessels. Various oils could be used in a number of ways, including regular consumption as a part of food, anointing, smearing, head massage, prescribed application to affected areas and oil pulling. Also, liquids may be poured on the patient’s forehead, a technique which is called Shirodhara (शिरोधारा).

CATARACT: Cataract in human eye–magnified view seen on examination with a slit lamp. Cataract surgery is mentioned in the Sushrut Sanhita, as performed with a special tool called the Jaba Mukhi Salaka, a curved needle used to loosen the obstructing phlegm and push it out of the field of vision. The eye would later be soaked with warm butter and then bandaged.

Panch Karm: Practice of the cleansing, known as Panch Karm, (पंचकर्म‌) is a therapeutic way of eliminating toxic elements from the body. It includes Vaman, Virechan, Basti, Nasy and Rakt Mokshan. Panch Karm is preceded by Poorv Karm (Preparatory Step) and is followed by Pashchat Karm and Peyadi Karm.

SUSHRUT SANHITA: It has 184 chapters, listed 1120 diseases 700 medicinal plants, 64 preparations, from mineral sources and 57 preparations from animal origin. There is evidence to prove that surgical operations were carried out successfully. Anaesthesia was in use and orthopaedic surgery was also conduced with ease, in  ancient India much-much before 5000 years.

AYURVED (8.1) आयुर्वेद :: अश्विनी कुमार देव वैद्य-चिकित्सक

A faith healer, psychoanalyst, and marriage-love counsellor.

AYURVED (8.1) आयुर्वेद 

अश्विनी कुमार :: देव वैद्य

 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 

By :: Pt. Santosh Bhardwaj

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उत्तरकुरु क्षेत्र में अश्व रूपी सूर्य और अश्वा रूप धारी संज्ञा से अश्विनी कुमारों की उत्पत्ति हुई। अश्व रूपी भगवान् सूर्य और अश्वा रूप धारी संज्ञा के मिथुन से अश्वनी कुमारों की उत्पत्ति हुई। भगवान् सूर्य के तेज से क्लांत संज्ञा ने अश्वा रूप ग्रहण किया, तब सायंकाल होने पर भगवान् सूर्य अश्व बनकर आहवनीय अग्नि में प्रवेश कर गए। इसके अतिरिक्त, अमावास्या काल में भी भगवान् सूर्य अश्व रूप में रहते हैं। चूँकि अमावास्या तथा सायंकाल से आगे रात्रि को समाधि की अवस्था कहा जा सकता है। अतः कार्तिक शुक्ल द्वितीय को अश्वनी कुमारों का जन्म हुआ। शुक्ल पक्ष समाधि से व्युत्थान का प्रतीक हो सकता है।

ये दोनों भगवान् सूर्य के पुत्र हैं, जो देव वैद्य-चिकित्सक हैं, जिन्हें देवता नहीं माना गया, मगर च्यवन ऋषि ने उन्हें यह स्थान दिलवाया और सोमरस पान करने का अधिकार दिलवाया। 

च्यवन ऋषि के लिये च्यवानं का प्रयोग हुआ है। [ऋग्वेद 10.17.1] 

आश्विन् ग्रह के संदर्भ में च्यवन-सुकन्या आख्यान  है। [शतपथ ब्राह्मण 4.1.5.1]

अश्विनी कुमार पितरद्वय हैं, जो सोम के कच्चे रूप सुरा को पीकर अपने यजमान रूपी पुत्र इन्द्र की रक्षा करते हैं। यह संदर्भ आश्विन् मास के कृष्ण पक्ष की पितृ पक्ष के रूप में प्रतिष्ठा के कारणों पर विचार करने के लिए उपयोगी है।[ऋग्वेद 10.131.5] 

अश्विनौ शब्द द्विवचन है। यह एक देवमिथुन है। इन्हें देवभिषजौ कहा जाता है। इनके अन्य नाम नासत्य और दस्र आते हैं। वृद्ध से युवा बना देना, टूटी जाँघ के स्थान पर लोहे की जाँघ लगा देना, अन्धकार से प्रकाश में ले जाना, समुद्र से डूबते को बचा लेना आदि उनके लिये सामान्य बातें हैं। 

यह चेतना की पराक् और अर्वाक् गति का प्रतीक हैं। अश्व अर्थात जिसका कल नहीं है, जो सदा वर्तमान है वह अश्व परमात्मा है। परमात्मा की शक्ति जीवात्मा को अजर-अमर कर सकती है और यदि अश्व का दूसरा अर्थ है। ब्राह्मण ग्रन्थों में इन्हें प्राणापानौ कहा गया है। प्राणों की यह पराक् और अर्वाक् गति ही अन्नमय, प्राणमय आदि कोशों को जोडने-सेतु तैयार करने वाली है। 

अश्विनी कुमारों के अंश, विश्कर्मा के पुत्र नल-नील ने रामेश्वर सेतु निर्माण किया।

इनका रथ तीन चक्रों-पहियों वाला है। दो चक्रों को तो ब्राह्मण लोग ऋतुथा जानते हैं, लेकिन तीसरे को सत्य की खोज करने वाले योगी ही जान सकते हैं। रथ के तीन पहिए हैं :– एक स्थूल शरीर में, एक सूक्ष्म शरीर में और एक कारण शरीर में। तीनों में एक ही चेतना एक साथ चलेगी। जब तक जीवात्मा अश्व नहीं बनता, तब तक वह अधिक से अधिक मन तक पहुँच सकता है। तब तक रथ के दो ही चक्र हैं :– स्थूल और सूक्ष्म शरीर। मन ऊर्ध्वमुखी होने पर तीन चक्रों का रथ बन जाता है। समाधि लग जाने पर अश्विनौ दिखाई नहीं पडते। सत्य हिरण्यय कोश है, वही समाधि है। अश्विनौ का नाम नासत्य (न-असत्य) है, जो संकेत करता है कि यह समाधि से नीचे की स्थिति है।

संज्ञा ::  मन रेतस्या बन जायें, प्राण गायत्री, चक्षु त्रिष्टुप्, श्रोत्र जगती, वाक् अनुष्टुप् छन्द बन जायें, यह संज्ञाएं हैं। [जैमिनीय ब्राह्मण 1.269]

आदित्यों ने अंगिरसों को श्वेत वडवा लाकर दी, लेकिन अङ्गिरसों ने अस्वीकार कर दिया। तब वडवा क्रोध में उभयमुखी सिंही हो गई। बाद में देवों द्वारा उसे स्वीकार कर लेने पर वह उत्तरवेदी बन गई। जब आदित्यों ने श्वेत अश्व के द्वारा स्वर्ग लोक प्राप्त कर लिया, तो अङ्गिरसों ने भी श्वेत वडवा को स्वीकार करके स्वर्ग लोक की प्राप्ति की। उत्तरवेदी, उत्तरकुरु है, जहाँ संज्ञा ने तप किया।[जैमिनीय ब्राह्मण 2.115-121] 

कुरुक्षेत्र में सृष्टि की रचना हुई। यही खाण्डव वन और देवों की यज्ञवेदी है। खाण्डव वन ही बाद में इन्द्रपस्थ बना। यही नागभूमि है और यही रावण का जन्म स्थल बिसरख। वडवाग्नि द्वारा समुद्र जल पान का उल्लेख पृथ्वी या संज्ञा के एक रूप वडवाग्नि के रूप में विकसित होकर असुरों का नाश करता है। उत्कृष्ट रूप में यही यज्ञ की उत्तरवेदी है। यहीं अश्विनी कुमारों का जन्म हुआ।[ब्राह्मण ग्रन्थ] 

ऋग्वेद की ऋचा 10.17.1  इस कथा को जोड़ती-समर्थन करती है।  

अश्विनी कुमार हमें अपनों से और परायों से संज्ञान प्राप्त करायें। संज्ञा के विराट रूप संज्ञान को प्राप्त होना ही अश्विनौ का जन्म लेना है। [अथर्ववेद 7.54.1]

प्रवर्ग्य नामक यज्ञ में भगवान् श्री हरी रूपी विष्णु का सर कटने पर भी  देवगणों के द्वारा कुरुक्षेत्र में शीर्ष रहित यज्ञ का अनुष्ठान हुआ, जिससे वांछित फलों की प्राप्ति नहीं हुई, तब अश्विनी कुमारों सर्वता की प्राप्ति के लिए यज्ञ के अध्वर्यु नामक ऋत्विज बने और दधीचि से प्राप्त मधु विद्या द्वारा यज्ञ के शीर्ष को जोडा गया। [तैत्तिरीय आरण्यक 4.1.1  तथा शतपथ ब्राह्मण 14.1.1.1]

दधीचि बताते हैं कि मधु विद्या क्या है? रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव इत्यादि अर्थात् कण-कण में उसी परमात्मा के रूप का दर्शन करना मधु विद्या है। इस यज्ञ में अध्वर्यु ऋत्विज यजमान रूपी सूर्य के तेज का क्रमशः विकास करता है। उस सूर्य को आकाश में विचरण करने योग्य, पतन रहित, 12 मास के 12 सूर्यों और 13वें मास के सूर्य को धारण करने वाला, चन्द्रमा, नक्षत्रों और ऋतुओं को धारण करने वाला बनाते हैं। [बृहदारण्यक उपनिषद 2.5.19]

प्रतिप्रस्थाता, अध्वर्यु ऋत्विज का एक सहायक, आसुरी पक्ष, आग्नीध्र तथा अन्य ऋत्विज यजमान-पत्नी या पृथ्वी  को दसों दिशाओं में व्याप्त होने वाली, मनु को वहन करने वाली अश्वा का रूप देते हैं। सूर्य के तेज, जिसे इस यज्ञ में घर्म या प्रवर्ग्य कहते हैं, का विकास पूर्ण हो चुकने पर यज्ञ में काम आने वाले मिट्टी से निर्मित महावीर पात्र तथा अन्य सहायक उपकरणों जैसे परीशास-संडासी आदि को उत्तरवेदी में स्थापित कर दिया जाता है। अश्विनी कुमारों द्वारा मिट्टी का शिवलिंग बनाना गया जो कि यज्ञ रूपी उत्तरवेदी में महावीर सर का प्रतीक है। परीशास आदि यज्ञ के उपकरणों से शरीर की बाहुओं आदि का प्रतीक लिया जाता है। प्रत्येक यज्ञ का एक शीर्ष होता है, जैसे अग्निहोत्र में आहवनीय अग्नि शीर्ष है, दर्श पूर्णमास यज्ञ में आज्यभाग द्वय व पुरोडाश शीर्ष हैं, सोम यज्ञ में हविर्धान यज्ञ का शीर्ष है, चातुर्मास्य में पयस्या यज्ञ की शीर्ष है। [त्वष्टा का रूप, तैत्तिरीय आरण्यक 3.3.1]

अतिथि को भी यज्ञ का शीर्ष कहते हैं। प्रवर्ग्य यज्ञ देवों के यज्ञ में अश्विनौ अध्वर्युओं द्वारा स्थापित शीर्ष अन्य सब यज्ञों को समाहित करता है।[शतपथ ब्राह्मण 14.2.2.48] 

 

सौत्रामणी यज्ञ :: देवराज इन्द्र ने त्वष्टा विश्वरूप का वध करके उसके यज्ञ कलश में उपलब्ध समस्त सोम को पी लिया। वह सोम इन्द्र के विभिन्न अङ्गों से विभिन्न हिंसक पशुओं के रूप में प्रकट हुआ। अश्वनी कुमारों और सरस्वती ने उसकी चिकित्सा की। [शतपथ ब्राह्मण 12.7.1.1; तैत्तिरीय ब्राह्मण 2.6.1.1] 

भेषज्य कर्म :: जिस सोमरस का, भक्तिरस का, आह्लाद का इन्द्र ने अचानक पान किया है, वह उसे आत्मसात् करने में समर्थ नहीं हो रहा है। अतः वह आह्लाद नमुचि असुर के रूप में (नमुचि अर्थात् जो एक बार पकड कर मुक्त न करे) तथा हिंसक प्रवृत्तियों के रूप में प्रकट हो रहा है। उस शक्ति को प्रवाहित होने का सम्यक् मार्ग कैसे दिया जाए? यह जो अतिरिक्त सोम है, यह आश्विन है। अश्वनी कुमारों  के पास इसकी भेषज यह है कि वह इसे ओंकार रूपी रथ पर आरूढ करके उसका वहन करते हैं। [शांखायन ब्राह्मण 18.1] 

अश्वनी कुमार और सरस्वती को भेषज कर्म में संयोग भक्ति के मुख्य रूप से चार प्रकार होते हैं :- हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ और प्रतिहार। इनसे सम्बन्धित पशु क्रमशः अज, अवि, गौ और अश्व हैं। ऋतुओं की दृष्टि से यह चार अवस्थाएं वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा व शरद होती हैं। [जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण 1.3.2.7] 

अज अवस्था अश्विनौ का और अवि अवस्था सरस्वती का ग्रह है, वह यहां आकर स्थित हो सकते हैं। [शतपथ ब्राह्मण 12.7.1.11] 

भक्ति मार्ग में अज और अवि अवस्था को पार करने के पश्चात् गौ और अश्व अवस्थाएं परस्पर मिश्रित हैं। अश्विनी कुमार ही गोमत् और अश्ववत् हैं। जब वह गोमत् होंगे तब उनका नाम नासत्य होगा और वह इन्द्रियों की पुष्टि गौ प्राणों द्वारा करेंगे। [ऋग्वेद 2.41.7, तैत्तिरीय ब्राह्मण 2.6.13.3 

उनका रथ अरिष्टनेमि प्रकार का होगा। [ऋग्वेद 1.180.10]

अग्नि के वाहन अज रूपी तेज का विकास प्रतिहार अवस्था में चक्षु के तेज के रूप में हो जाता है, ऐसा चक्षु जिसे कण-कण में उस परमात्मा का ही रूप दिखाई पडने लगे, में अश्वनी कुमारों को शरद या प्रतिहार  हैं। [जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण 1.18.2.9]

प्रतिहार से अगली निधन अवस्था में चक्षु ग्रह के बदले श्रोत्र ग्रह बन जाता है। अतः अश्वनी कुमारों कहीं छाग, कहीं चक्षु तो कहीं श्रोत्र हैं। [शतपथ ब्राह्मण 12.8.2.22, 4.1.5.1]

वे कपिला गौ के कर्णों में स्थिति हैं। उन्हें कर्णवेध संस्कार करने वाला कहा गया है। सरस्वती के ग्रह अवि वीर्य  हैं,  जिनका विकास प्राण, अपान, उदान, व्यान आदि अन्य रूपों में होता है। [शतपथ ब्राह्मण 12.8.2.22]

योग की दृष्टि से अवि और असि, वरुणा नदी अथवा इडा या पिङ्गला नाड़ी  हैं, जिनके मिलने से तीसरी सरस्वती या सुषुम्ना नाडी का विकास होता है। 

अन्य सब नदियाँ तो पर्वतों से निकल कर समुद्र में विलीन होती हैं, लेकिन सरस्वती नदी ऐसी है जो विज्ञानमय कोश रूपी सिन्धु से निकलती है। यह सरस्वती या सुषुम्ना या सिन्धु नदी ऐसी है जो हिरण्यवर्तनी है, हिरण्यय कोश के, समाधि अवस्था के बार-बार चक्कर लगाती रहती है और अपने साथ अश्विनौ को भी ले जाती है और रस का आस्वादन कराती है।[ऋग्वेद 5.75.2 तथा 8.26.18] 

अश्विनौ से  प्राणों का उद्धार करने वाली वर्ति में स्थापित करने की प्रार्थना की गई है। [ऋग्वेद 8.26.15] 

अश्विनौ ने वर्तिका को वृक के मुख से बचाया। यह वर्तिका, दीपक की बत्ती यही सरस्वती नाडी है। अश्विनौ का तेज उसे जलाता है।  [ऋग्वेद 1.111.6.14] 

अश्विनौ अङ्गों की चिकित्सा आत्मा में की  तथा सरस्वती ने आत्मा को अङ्गों से युक्त किया, अङ्गों द्वारा धारण किया।  [तैत्तिरीय ब्राह्मण 2.6.4.6; शतपथ ब्राह्मण 12.9.1.4]  

यज्ञ के अङ्गों का निर्माण उच्छिष्ट से, अतिरिक्त शक्ति से होता है। [अथर्ववेद 11.9.6]

दिवस काल में अश्विनौ और रात्रि काल में सरस्वती हमारी रक्षा करें। [तैत्तिरीय ब्राह्मण 2.6.12.3;  2.6.12.6]  

अश्विनौ के रथ को प्रातःकाल में जुडने वाला कहा गया है जो उषा को अपने रथ पर बैठा कर ले जाते हैं।[ऋग्वेद]

नकुल और सहदेव की उत्पति अश्विनी कुमारों से हुई। नकुल अश्वों के विशेषज्ञ और सहदेव गायों के विशेषज्ञ थे। [महाभारत]

विराट के राज्य में सहदेव का नाम अरिष्टनेमि  है। जब अश्विनी कुमार अश्वावत् होंगे तो वे वीर्य और बल की पुष्टि करेंगे। जैसे अश्विनी कुमार रूपवान् हैं, ऐसे ही नकुल व सहदेव भी बहुत रूपवान् हैं, विशेषकर नकुल, क्योंकि स्वर्गारोहण के समय जब नकुल मृत होकर गिर पडते हैं तो युधिष्ठिर उसका कारण बताते हैं कि उनको अपने रूप पर बहुत गर्व था। सहदेव के मृत होने पर उन्होंने कहा कि उनको अपनी प्रज्ञा पर बहुत गर्व था। 

प्रज्ञा द्वारा ही चक्षु पर आरूढ होकर सब रूपों के दर्शन होता है। अतः गौ और अश्व या नकुल और सहदेव को एक दूसरे से अभिन्न हैं। [कौशीतकि उपनिषद 3.4] Photo:

प्राण-अपान का प्रजापति के शरीर को त्यागना और फिर द्वितीया तिथि को अश्विनौ के रूप में पुनः शरीर धारण करने के संदर्भ में अश्विनौ देवता का उल्लेख है। [वराह पुराण]

प्राण-अपान का सम्बन्ध सरस्वती से है। [अथर्ववेद 7.55]

“सवितुः प्रसवितृभ्यां अश्विनौर्बाहुभ्यां पूष्णोः हस्ताभ्यां” इत्यादि। सविता से सव प्राप्त करना ही अश्विनौ का सर्व बनना है। अश्विनौ उस शक्ति को पूषा रूपी वत्स को देते हैं, जो उस शक्ति का सर्वत्र च्यावयन करता है, उसे वितरित करता है। [ऋग्वेद 10.17.1]